अखिल भारतीय संस्कृत परिषद्, लखनऊ का “सनातन धर्म और भारतीय वैदिक संस्कृति का सामंजस्य” विषयक व्याख्यान
रामानन्द सम्प्रदाय के वर्तमान जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी का श्रद्धालुओं ने किया भव्य अभिनंदन समारोह
लखनऊ। अखिल भारतीय संस्कृत परिषद्, लखनऊ की ओर से “सनातन धर्म और भारतीय वैदिक संस्कृति का सामंजस्य” विषय पर एक विशिष्ट व्याख्यान और रामानन्द सम्प्रदाय के वर्तमान जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी का भव्य अभिनंदन समारोह आयोजित हुआ। ज्ञानपीठ और पद्मविभूषण जैसे सैकड़ों सर्वोच्च सम्मानों से विभूषित, 300 से अधिक ग्रंथों के रचयिता तथा प्रस्थानत्रयी व 11 उपनिषदों पर भाष्य लिखने वाले जगद्गुरु रामभद्राचार्य (आजीवन कुलाधिपति, जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग राज्य विश्वविद्यालय) इस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता थे।
कार्यक्रम के दौरान अखिल भारतीय संस्कृत परिषद् के विकास के लिए दो बड़ी घोषणाएं की गईं। जिसमें विधायक नीरज बोरा ने परिषद् के पुस्तकालय आदि के विकास के लिए अपनी विधायक निधि से 5 लाख रुपये देने की घोषणा की। जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी ने भी तुलसीपीठाधीश्वर के रूप में परिषद् को 1 लाख रुपये दान करने का ऐलान किया।
कार्यक्रम में देश के कई प्रख्यात विद्वान और गणमान्य नागरिक शामिल हुए। इनमें जगद्गुरु के परम शिष्य श्रीरामचन्द्राचार्य जी ने अपने वक्तव्य से कार्यक्रम को विशिष्ट बनाया। राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. रामसेवक दुबे ने जगद्गुरु जी के भाष्यों की विशेषताओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। परिषद् के अध्यक्ष डॉ. चन्द्रभूषण त्रिपाठी ने जगद्गुरु जी का अभिनंदन पत्र पढ़ा और वैदिक संस्कृति की विशेषताओं को सामने रखा। संस्था का परिचय परिषद् के मंत्री प्रो. प्रयाग नारायण मिश्र ने दिया।
जगद्गुरु दिव्यांग विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. शिशिर कुमार पाण्डेय, परिषद् के उपाध्यक्ष डॉ. रवि किशोर त्रिवेदी, कोषाध्यक्ष डॉ. युग्गीलाल दीक्षित, डॉ. बिधुदत्त पाण्डेय, प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. सूर्यकान्त त्रिपाठी, सचिव आवास विकास (IAS) डॉ. अनिल कुमार शुक्ल, डॉ. आशुतोष द्विवेदी, संस्कृत भारती के क्षेत्रीय प्रचारक प्रमोद पंडित, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रो. अनिल प्रताप गिरि और लखनऊ विश्वविद्यालय के संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो. अभिमन्यु सिंह सहित कई विभागों के प्रोफेसर्स, शोध छात्र और सैकड़ों संस्कृतानुरागी उपस्थित रहे।
नई पीढ़ी को सनातन मूल्यों से जोड़ना जरूरी: जगद्गुरु रामभद्राचार्य
मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी ने कहा कि भारत को विश्वगुरु बनाने के लिए नई पीढ़ी को सनातन धर्म और वैदिक संस्कृति के मूल्यों से परिचित कराना अनिवार्य है। उन्होंने ‘भारतवर्ष’ और ‘भक्त’ की अनूठी व्याख्या करते हुए कहा कि जो भारतवर्ष की भक्ति करता है, वही सच्चा भक्त और भारतीय है। जगद्गुरु जी ने पर्यावरण संरक्षण पर विशेष जोर देते हुए कहा कि “सनातन धर्म के मूल सिद्धांत सत्य, अहिंसा, करुणा, सहिष्णुता और प्रकृति के प्रति सम्मान को बढ़ावा देते हैं। यदि प्रकृति सुरक्षित रहेगी, तभी मानव का अस्तित्व भी बचा रहेगा।”
कार्यक्रम की शुरुआत कुलवंत और उनके साथियों द्वारा सस्वर वैदिक मंगलाचरण से हुई और समापन शांतिपाठ के साथ किया गया। संचालन परिषद् के सम्मानित सदस्य प्रो. अशोक कुमार शतपथी ने किया।

