ऐतिहासिक मुगल शैली से लेकर आधुनिक संवेदनाओं तक दिखा कला का अनोखा विस्तार
39 दुर्लभ कृतियों के माध्यम से जीवंत हुई बनारस घराने की समृद्ध गुरु-शिष्य परंपरा
लखनऊ: शहर स्थित कोकोरो आर्ट गैलरी मदन मोहन मालवीय मार्ग, जॉपलिंग रोड में बनारस घराने की बरसों पुरानी समृद्ध लघुचित्र परंपरा को समर्पित कला प्रदर्शनी ‘MINIATURES—बनारस घराना’ का भव्य शुभारंभ हुआ। 6 अक्टूबर 2026 की शाम उत्तर प्रदेश शासन के पर्यटन, संस्कृति एवं परिवहन विभाग के अपर मुख्य सचिव आईएएस अमृत अभिजात ने दीप प्रज्वलित कर प्रदर्शनी का आधिकारिक उद्घाटन किया। प्रसिद्ध क्यूरेटर वंदना सहगल के क्यूरेशन और ‘A Repertoire of Paintings by Generations’ की मुख्य अवधारणा पर आधारित यह कला प्रदर्शनी 7 से 28 अक्टूबर 2026 तक (रविवार को छोड़कर) दर्शकों और कला-प्रेमियों के अवलोकनार्थ खुली रहेगी।
गुरु-शिष्य परंपरा और 39 दुर्लभ कलाकृतियों का संगम
प्रदर्शनी में बनारस की लघुचित्र परंपरा से जुड़ी कई पीढ़ियों—उस्ताद मुलचंद प्रसाद, उस्ताद राम प्रसाद, उस्ताद शारदा प्रसाद, उस्ताद मुकुंद प्रसाद, उस्ताद गोपाल प्रसाद, वंश श्री यादव और अंकित प्रसाद—की प्राकृतिक रंगों से बनी कुल 39 नायाब कृतियाँ प्रदर्शित की गई हैं। यह आयोजन उस अटूट गुरु-शिष्य परंपरा का जीवंत दस्तावेज है, जिसके तहत मुगल लघुचित्र की पारंपरिक और सूक्ष्म तकनीक स्थानीय धार्मिक, सांस्कृतिक व सामाजिक जीवन के साथ निरंतर संवाद करते हुए समय के साथ पल्लवित हुई है। क्यूरेटर वंदना सहगल के अनुसार, यह परंपरा मुगल दरबारी चित्रकला से जुड़ी है, जब शाह आलम द्वितीय के समय बनारस आए शाही चित्रकारों से अहीर समुदाय के युवा सिखी ने इस कला को सीखा और अगली पीढ़ियों तक पहुँचाया।

ऐतिहासिक विरासत से समकालीन दौर तक का कलात्मक सफर
बनारस घराने की सबसे बड़ी विशिष्टता इसका समन्वयवादी दृष्टिकोण है, जहाँ मुगल शैली की तकनीकी बारीकी, महीन रेखाएँ और रंग-संयोजन स्थानीय धार्मिक आख्यानों, देवी-देवताओं, प्रकृति और भारतीय सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ एकरूप हो जाते हैं। इस परंपरा के प्रमुख स्तंभ उस्ताद मुलचंद ने भित्तिचित्र, पुस्तक-चित्रण और लिथोग्राफी के माध्यम से रामायण व हनुमानबाहुक जैसे ग्रंथों को नया सांस्कृतिक आयाम दिया, वहीं उस्ताद राम प्रसाद ने व्यक्तिचित्रण व हाथीदाँत पर चित्रकारी में अद्भुत निपुणता दिखाई। आगे उस्ताद शारदा प्रसाद ने भारत कला भवन (BHU) के माध्यम से, उस्ताद मुकुंद प्रसाद ने पहाड़ी व राजस्थानी प्रभावों के समावेश से और उस्ताद गोपाल प्रसाद ने शोध व दस्तावेजीकरण से इसे समृद्ध किया। वर्तमान में अंकित प्रसाद और वंश श्री यादव जैसे युवा चित्रकार इस पारंपरिक तकनीकी जड़ को सहेजते हुए इसमें समकालीन विषय व आधुनिक संवेदनाओं का समावेश कर रहे हैं।

