साहित्य सृजन और लोक कला का महाकुंभ: डॉ. जीवन शुक्ल और शीला शर्मा को मिला प्रतिष्ठित सम्मान

Anoop

October 22, 2026

साहित्य साधना का मुख्य ध्येय समाज के दुख-दर्द को ईमानदारी से उभारना है: डॉ. जीवन शुक्ल

दृढ़ इच्छाशक्ति से मिली सफलता, पैरों से पेंटिंग सीखाकर बच्चों को तराश रहीं शीला शर्मा

लखनऊ: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के निराला सभागार में डॉ. लक्ष्मीशंकर मिश्र ‘निशंक’ की 108वीं जयंती के अवसर पर आयोजित एक गरिमामयी समारोह में साहित्य और लोक संस्कृति का अनूठा संगम देखने को मिला। वरिष्ठ कवि उदय प्रताप सिंह की अध्यक्षता और मुख्य अतिथि प्रो. सूर्यप्रसाद दीक्षित की प्रेरणादायी मौजूदगी में संपन्न इस आयोजन ने साहित्य प्रेमियों के हृदयों को झकझोर दिया। समारोह का आयोजन डॉ. लक्ष्मीशंकर मिश्र ‘निशंक’ अध्ययन संस्थान, लखनऊ की ओर से किया गया।

समारोह के केंद्र में कन्नौज के ओजस्वी और सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. जीवन शुक्ल रहे, जिन्हें उनकी उत्कृष्ट साहित्यिक साधना के लिए ‘डॉ. लक्ष्मीशंकर मिश्र निशंक साहित्य सम्मान-2026’ से अलंकृत किया गया। वहीं, लखनऊ की अनन्य कलासाधना की प्रतीक शीला शर्मा को ‘विद्या मिश्र लोक संस्कृति सम्मान-2026’ प्रदान किया गया। दोनों ही मनीषियों को 11-11 हजार रुपये की सम्मान राशि, अंगवस्त्र, प्रतीक चिह्न और प्रशस्ति-पत्र भेंट कर सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम का विधिवत आरंभ डॉ. धनीराम अवस्थी के ओजस भरे स्वरों में प्रस्तुत सस्वर वाणी वंदना से हुआ। संस्थान के अध्यक्ष डॉ. कमलाशंकर त्रिपाठी एवं योगेन्द्र द्विवेदी ने सभाध्यक्ष और मुख्य अतिथि को उत्तरीय व उपहार भेंट कर उनका अभिनंदन किया। मंच पर उपस्थित सभी विशिष्ट अतिथियों का स्वागत डॉ. निशंक संस्थान के अध्यक्ष डॉ. कमलाशंकर त्रिपाठी ने किया। मुख्य अतिथि प्रो. सूर्यप्रसाद दीक्षित ने अपने उद्बोधन में स्मरण किया कि कैसे निशंक जी ने आजीवन मंच की पवित्रता और उसकी गरिमा को जीवंत बनाए रखा।

‘साहित्यकार का धर्म सत्ता से जुड़ना नहीं, समाज के दुख-दर्द को बयां करना है’

सम्मान ग्रहण कर अपने व्याख्यान में डॉ. जीवन शुक्ल ने साहित्य जगत को झकझोरते हुए कहा कि किसी भी रचनाकार या कवि का वास्तविक धर्म सत्ता की परिक्रमा करना नहीं, बल्कि समाज के छिपे हुए दुख-दर्द को पूरी ईमानदारी से शब्द देना है। उन्होंने आह्वान किया कि कला और रचनाओं के माध्यम से समाज में चेतना और प्रेरणा की ज्योति जलानी चाहिए। अपनी संवेदनशील पंक्तियाँ साझा करते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि आज की कविता में बेचारी लाचारी केवल रोटी के लिए संघर्ष करती हुई दिखाई देती है।

पैरों से पेंटिंग गढ़ने वाली शीला शर्मा की प्रेरणादायक गाथा

‘विद्या मिश्र लोक संस्कृति सम्मान’ से सम्मानित होने वाली शीला शर्मा ने जब अपने जीवन संघर्ष के पन्ने पलटे, तो पूरा सभागार अछूता नहीं रह सका। उन्होंने बताया कि बचपन से कला के प्रति उनका अगाध प्रेम था, और जब परिस्थितियाँ विपरीत हुईं तो उन्होंने हार मानने के बजाय अपने पैरों को ही कूची बना लिया और पैरों से पेंटिंग बनाना सीख लिया। जीवन के तमाम झंझावातों और उतार-चढ़ावों को मात देते हुए आज वे उन्नाव मोहान रोड स्थित शीला प्रशिक्षण केंद्र का संचालन कर रही हैं, जहाँ वे नौनिहालों को कला की बारीकियाँ सिखा रही हैं। उन्होंने इस स्नेह और सम्मान के लिए डॉ. लक्ष्मीशंकर मिश्र निशंक अध्ययन संस्थान के प्रति हृदय से आभार व्यक्त किया।

गीतों और कविताओं की फुहार से सराबोर हुआ सभागार

साहित्यिक सांस्कृतिक संध्या को और अधिक जीवंत बनाते हुए, लखनऊ के सुप्रसिद्ध गीतकार स्वर्गीय लालता प्रसाद मिश्र ‘पीयूष’ की सुपुत्री मीनाक्षी ने अपने पिता के अमर गीतों का सस्वर पाठ कर वहाँ मौजूद तमाम साहित्यप्रेमियों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके साथ ही, युवा रचनाकार धीरज मिश्र ‘शांडिल्य’ ने अपनी चुनिंदा रचनाओं का पाठ कर श्रोताओं को आनंदित कर दिया।

इस भव्य साहित्यिक समागम में फुटपेंटर शीला शर्मा के जीवनसाथी वरिष्ठ मूर्तिकार सुधीर शर्मा, डॉ. लक्ष्मीशंकर मिश्र ‘निशंक’ अध्ययन संस्थान के अध्यक्ष डॉ. कमला शंकर त्रिपाठी, मंत्री मुकुल मिश्र, निदेशक योगेन्द्र द्विवेदी, उपाध्यक्ष प्रो. उषा सिन्हा और अनिल मिश्र सहित राजधानी के अनेक गणमान्य साहित्यप्रेमी और रचनाकार मौजूद रहे।

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