मलखान सिंह सिसौदिया कविता पुरस्कार 2025: भोपाल की कवयित्री आरती को उनके संग्रह ‘मूक बिम्बों से बाहर’ के लिए किया जाएगा सम्मानित

Anoop

October 22, 2026

वर्ष 2007 से प्रतिवर्ष देश के उत्कृष्ट युवा कवि को प्रदान किया जाता है यह प्रतिष्ठित सम्मान

समय के अंतर्द्वंद्वों और इतिहास से बाहर निकलकर वर्तमान के सच से रूबरू कराती हैं कविताएं

लखनऊ: साहित्य जगत से जुड़ी एक अहम खबर के तहत, के.पी. सिंह मेमोरियल चैरिटेबल ट्रस्ट की अध्यक्ष नमिता सिंह ने घोषणा की है कि वर्ष 2025 का प्रतिष्ठित ‘मलखान सिंह सिसौदिया कविता पुरस्कार’ भोपाल की प्रसिद्ध कवयित्री आरती को उनके कविता संग्रह ‘मूक बिम्बों से बाहर’ के लिए प्रदान किया जाएगा। यह पुरस्कार आगामी 15 नवंबर 2026 को लखनऊ की कैफ़ी आज़मी एकेडमी में दोपहर 3:30 बजे से आयोजित होने वाले एक विशेष समारोह में अर्पित किया जाएगा।

सुप्रसिद्ध कवि मलखान सिंह सिसौदिया द्वारा वर्ष 2007 में स्थापित यह प्रतिष्ठित पुरस्कार प्रतिवर्ष किसी देश के उत्कृष्ट युवा कवि को उनकी रचनात्मकता के लिए दिया जाता है। इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए इससे पहले यह सम्मान दिनेश कुशवाह, एकांत श्रीवास्तव, श्रीप्रकाश शुक्ल, शैलेय, अशोक तिवारी, भरत प्रसाद, संजीव कौशल, निशांत, संतोष चतुर्वेदी, रमेश प्रजापति, प्रदीप मिश्र, विशाल श्रीवास्तव, ज्ञान प्रकाश चौबे, बच्चा लाल ‘उन्मेष’, शंकरानन्द, अनुज लुगुन और सीमा सिंह जैसे चर्चित व प्रतिष्ठित रचनाकारों को मिल चुका है।

कवयित्री आरती के इस संग्रह पर बात करते हुए प्रख्यात कवि राजेश जोशी ने लिखा है कि “यह समय मेरा समय नहीं है फिर भी मैं इस समय में हूँ” जैसे द्वंद्व के बीच आरती अपने समय के सच को टटोलती हैं। वे समय के अंतर्द्वंद्वों और अंतर्विरोधों को परखने के लिए मिथकों, स्मृतियों और इतिहास के तमाम संदर्भों को खंगालती हैं। उनकी नजरें मिथकीय आख्यानों को वर्तमान की तरह देखती हैं, जहां वे मिथक और इतिहास के दायरे से बाहर निकलकर सीधे अपने समय की वास्तविक सच्चाई से रूबरू होने की जद्दोजहद करती नजर आती हैं।

राजेश जोशी आगे लिखते हैं कि ये कविताएँ केवल एक स्त्री की आँख से देखा हुआ समय भर नहीं हैं, बल्कि यह उन सभी स्थापित सीमा रेखाओं का प्रभावशाली अतिक्रमण करती हैं। इनमें पुरुष वर्चस्व के खिलाफ स्त्री संघर्ष की लंबी परंपरा के साथ-साथ वर्तमान समय के उन कड़े दृश्यों को भी स्पष्ट रूप से लक्षित किया जा सकता है, जहां एक तरफ सिरफिरे और आवारा समझे जाने वाले कलाकार बैनर-पोस्टर लेकर राजमार्गों पर युद्ध के खिलाफ खड़े हैं, तो दूसरी तरफ आज की लोकतांत्रिक सत्ताएँ जेल की दीवारों को और अधिक मजबूत करने में जुटी हुई हैं।

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