उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने की ‘प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त एवं जगदीश गुप्त की स्मृति’ में संगोष्ठी
हिंदी भवन के प्रेमचंद सभागार में हुआ संगोष्ठी का आयोजन जुटे विद्वान एवं साहित्यप्रेमी
लखनऊ। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ओर से हिंदी भवन के प्रेमचंद सभागार में ‘प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त एवं जगदीश गुप्त की स्मृति’ में एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं डॉ. कामिनी त्रिपाठी की वाणी वंदना के साथ हुआ।
संस्थान की प्रधान संपादक डॉ. अमिता दुबे ने सम्मानित अतिथिगण—डॉ. राकेश कुमार शुक्ल, डॉ. पवन अग्रवाल एवं डॉ. ओंकारनाथ द्विवेदी को उत्तरीय एवं स्मृति चिह्न भेंट कर उनका औपचारिक स्वागत किया।
संगोष्ठी को संबोधित करते हुए डॉ. राकेश कुमार शुक्ल ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद का स्पष्ट मानना था कि यथार्थ चित्रण ही साहित्य का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। प्रेमचंद के साहित्य में भूत, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालों का समावेशन मिलता है, जिसमें भारत की स्वतंत्रता के प्रति गहरी भावनाएं और महात्मा गांधी के आदर्शों की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। वे साहित्य एवं सामाजिक परंपराओं में सुधार के पक्षधर थे। उनकी रचना ‘प्रेमाश्रम’ ने किसानों के आंदोलन को एक नई दिशा दी। प्रेमचंद एक भविष्यदृष्टा साहित्यकार थे, जिनकी रचनाएँ आज के दौर में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।
डॉ. पवन अग्रवाल ने मैथिलीशरण गुप्त के योगदान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वे भारतीय संस्कृति के सच्चे संवाहक और लोकधर्मी कवि हैं। उन्होंने परंपराओं को तोड़े बिना आधुनिक काल को व्याख्यायित किया। महात्मा गांधी से अत्यधिक प्रभावित गुप्त जी को स्वयं गांधी जी ने ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि दी थी। उनकी प्रसिद्ध कृतियों में भारत-भारती, साकेत, नहुष, यशोधरा, गुरुकुल और जयद्रथ वध प्रमुख हैं। वे नारी स्वतंत्रता के हिमायती थे और एक मानवतावादी कवि तथा नवजागरण के नायक के रूप में सामने आते हैं।
डॉ. ओंकारनाथ द्विवेदी ने जगदीश गुप्त के व्यक्तित्व पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि जगदीश गुप्त ने ही मैथिलीशरण गुप्त के जन्मदिन को ‘कवि दिवस’ के रूप में मनाने का पहला प्रस्ताव रखा था। वे ब्रजभाषा के मर्मज्ञ, सहृदय कवि होने के साथ-साथ एक उत्कृष्ट चित्रकार भी थे। उन्होंने नई कविता को आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका मानना था कि ‘चित्रकला सभी कलाओं की आँख है’ और कविता मनुष्यता की मातृभाषा होती है। कार्यक्रम के दौरान शोधार्थी राहुल द्वारा प्रेमचंद की कहानी ‘कज़ाकी’, जितेन्द्र कुमार द्वारा ‘परीक्षा’ तथा सौम्या मिश्रा द्वारा ‘आत्माराम’ का पाठ किया गया। इसके अतिरिक्त मैथिलीशरण गुप्त की कविता ‘प्रकृति’ तथा जगदीश गुप्त की ‘वर्षा और भाषा’ व ‘सांझ’ का पाठ भी किया गया।

