हड़प्पाकालीन शिल्प परंपराओं और मनका निर्माण की ग्राइंडिंग-पॉलिशिंग तकनीक का दिया गया व्यावहारिक ज्ञान
300 से अधिक आवेदनों में से ‘पहले आओ, पहले पाओ’ के आधार पर चुने गए 150 शोधार्थियों व छात्रों ने लिया भाग
लखनऊ: उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्त्व निदेशालय, लखनऊ द्वारा छतर मंजिल परिसर में आयोजित ‘प्राचीन मनका निर्माण की तकनीक: हड़प्पाकालीन मनकों के विशेष संदर्भ में’ विषयक दो दिवसीय कार्यशाला का समापन हुआ। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य प्राचीन मनका निर्माण की पारंपरिक तकनीकों का प्रायोगिक प्रशिक्षण प्रदान करना और विद्यार्थियों व शोधार्थियों को भारत की समृद्ध पुरातात्त्विक एवं शिल्प परंपराओं से रूबरू कराना था। दो दिन में मनका निर्माण कलाकारों के अनुभवों व प्रशिक्षण से प्रतिभागी रूबरू हुए।
विभिन्न आकारों (गोल, बेलनाकार, ढोलकाकार) के मनकों को पिरोये प्राचीन सुंदर हार-माला, कंगन और ब्रेसलेट, करधनी एवं कान की बालियां व झुमके देखकर कलाप्रेमी खूब प्रभावित हुए। कार्यशाला के प्रति जबरदस्त उत्साह देखने को मिला, जिसके तहत 300 से अधिक प्रतिभागियों ने ऑनलाइन पंजीकरण कराया। हालांकि, प्रशिक्षण सुविधाओं और क्षमता को ध्यान में रखते हुए ‘पहले आओ, पहले पाओ’ के आधार पर 150 प्रतिभागियों का चयन स्वीकार किया गया।

‘हड़प्पा सभ्यता की प्राचीन मनका निर्माण तकनीकों’ पर दो दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ शुक्रवार को उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व निदेशालय, लखनऊ की निदेशक रेनू द्विवेदी, राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित मुख्य प्रशिक्षक एवं प्रस्तर शिल्पकार अनवर हुसैन शेख (खंभात, गुजरात), प्रताप भाई परमार, नीतू अग्रवाल, सहायक आचार्य, अवध बालिका डिग्री कॉलेज तथा विभाग के वरिष्ठ पुरातत्वविद राम विनय ने किया। प्रशिक्षकों एवं अतिथियों स्वागत एवं सम्मान हुआ था।

कार्यशाला के दूसरे और अंतिम दिन प्रतिभागियों को मनका निर्माण की ग्राइंडिंग (घर्षण द्वारा आकार देना) और पॉलिशिंग (सतह को चिकना व चमकदार बनाना) तकनीकों का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षक अनवर हुसैन शेख, आफताब हुसैन शेख और प्रताप भाई माथुर भाई परमार ने इन पारंपरिक विधियों का सीधा प्रदर्शन कर इनकी तकनीकी विशेषताओं के बारे में विस्तार से बताया। शोधार्थियों और छात्र-छात्राओं ने खुद इन प्रक्रियाओं में हिस्सा लेकर हड़प्पाकालीन मनका निर्माण की बारीकियों को करीब से समझा। इस तरह के प्रायोगिक प्रशिक्षण से प्राचीन शिल्पकारों के तकनीकी कौशल, आकार निर्धारण और सतह परिष्करण को समझने में काफी मदद मिलती है।

समापन सत्र के दौरान सभी प्रतिभागियों ने अपने अनुभवों और सीख को साझा करते हुए इसे बेहद ज्ञानवर्धक और उपयोगी आयोजन बताया। कार्यक्रम के अंत में उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्त्व निदेशालय के उत्खनन एवं अन्वेषण अधिकारी रामविनय तथा संस्कृति विभाग के अनु सचिव मनोज कुमार ने सभी प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र प्रदान किए। कार्यक्रम का सफल संचालन बलिहारी सेठ द्वारा किया गया। इस दौरान विभागीय अधिकारी, कर्मचारी, प्रशिक्षक और विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए शोधार्थी व छात्र-छात्राएं मौजूद रहे। यह आयोजन पुरातात्त्विक अध्ययन को व्यावहारिक बनाने और भारत की सांस्कृतिक विरासत के प्रति जागरूकता बढ़ाने की दिशा में एक अहम कदम साबित हुआ।

हड़प्पाकालीन मनका निर्माण तकनीक
प्राचीन हड़प्पा सभ्यता में मनका निर्माण अकीक, कर्नेलियन और स्फटिक जैसे कच्चे माल के चयन से शुरू होता था। इसके बाद पत्थरों को तोड़कर व घिसकर आकार दिया जाता था और विशेष ड्रिल मशीनों से उनके आर-पार छेद किए जाते थे। अंत में, सतह को चिकना बनाने के लिए पॉलिश की जाती थी और रंग उभारने के लिए उन्हें भट्टी में पकाया जाता था।

