2007 में सोशल इंजीनियरिंग के बल पर सत्ता पाने वाली बसपा आज अपने ही कद्दावर ब्राह्मण नेताओं के पलायन से जूझ रही है
अंटू मिश्रा जैसे वरिष्ठ नेताओं के छिटकने के बाद पार्टी के इस बड़े वोट बैंक साधने की पूरी कमान सतीश चंद्र मिश्रा पर टिक गई है
लखनऊ। वर्ष 2007 में सोशल इंजीनियरिंग के बूते 80 में से 41 ब्राह्मण विधायकों को जिताकर सत्ता के शिखर पर पहुंची बहुजन समाज पार्टी (बसपा) आज उसी मजबूत आधार में बिखराव की चुनौती से जूझ रही है। आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अपने राजनीतिक वजूद को बचाने के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती एक बार फिर ब्राह्मण समुदाय को साधने की रणनीति पर काम कर रही हैं, लेकिन कद्दावर ब्राह्मण नेताओं का लगातार साथ छोड़ना पार्टी के लिए बड़ा झटका साबित हो रहा है। हाल ही में पूर्व मंत्री अंटू मिश्रा का पार्टी से निष्कासन इसी घटते प्रभाव की ताजा कड़ी माना जा रहा है।
दिग्गजों का मोहभंग: हाथी से उतरकर दूसरे दलों में थामा हाथ
पिछले एक दशक में बसपा की ‘सियासी नर्सरी’ में तैयार हुए कई प्रमुख नेताओं ने पार्टी का किनारा कर लिया है:
- ब्रजेश पाठक: बसपा के पूर्व सांसद ब्रजेश पाठक 2017 में भाजपा में शामिल हुए और वर्तमान में उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री हैं।
- नकुल दुबे व अन्य: पूर्व मंत्री नकुल दुबे 2022 में कांग्रेस में शामिल हो गए। इसके अलावा दिवंगत रामवीर उपाध्याय, रंगनाथ मिश्रा, विनय शंकर तिवारी का कुनबा और पूर्व विधान परिषद सभापति गणेश शंकर पांडेय जैसे प्रभावसाली चेहरे भी बसपा से दूर हो चुके हैं।
- पांडेय परिवार का पलायन: अंबेडकरनगर से पूर्व सांसद राकेश पांडेय और उनके बेटे पूर्व सांसद रितेश पांडेय ने भी बसपा का साथ छोड़ दिया है।
अंटू मिश्रा के निष्कासन से झटका
कानपुर के कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री अंटू मिश्रा पर पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाकर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। इससे पहले मार्च 2024 में भाजपा दफ्तर पहुंचने पर उनके भाजपा में शामिल होने की अटकलें तेज हुई थीं। अंटू मिश्रा ने इस कार्रवाई पर कहा है कि वे सही समय आने पर अपनी बात जनता और मीडिया के सामने रखेंगे।
खुशी दुबे केस से लेकर सम्मेलन तक, सतीश मिश्रा ही आखिरी उम्मीद
पार्टी ने ब्राह्मणों को जोड़ने के लिए बिकरू कांड की आरोपी खुशी दुबे का केस लड़ने से लेकर वर्ष 2021 में राज्यभर में प्रबुद्ध वर्ग (ब्राह्मण) सम्मेलनों का आयोजन किया था। आगामी चुनाव के लिए भी शुरुआती टिकट ब्राह्मण उम्मीदवारों को दिए गए हैं।
हालांकि, अधिकांश वरिष्ठ चेहरों के अलग होने के बाद अब ब्राह्मण समाज को पार्टी से जोड़ने की पूरी कमान राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा और उनके परिवार के कंधों पर टिक गई है। संगठन में वे ही इकलौते बड़े ब्राह्मण चेहरे बचे हैं, जिनके सहारे बसपा अपनी खोई हुई सियासी जमीन तलाशने की कोशिश में है।

