भारतीय सेना का युद्ध नायक को भावपूर्ण नमन: लखनऊ में परमवीर चक्र विजेता कर्नल धन सिंह थापा की स्मृति में इंडोर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स समर्पित
1962 के भारत-चीन युद्ध में दिखाया था अदम्य साहस, लखनऊ छावनी के सूर्य खेल परिसर में बेटियों की उपस्थिति में हुआ अनावरण
लखनऊ। भारतीय सेना ने अपने एक महान युद्ध नायक को भावपूर्ण सम्मान देते हुए लखनऊ छावनी स्थित सूर्य खेल परिसर के अत्याधुनिक इंडोर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स को परमवीर चक्र विजेता लेफ्टिनेंट कर्नल धन सिंह थापा की स्मृति में समर्पित किया है। यह पहल उनके अदम्य साहस, असाधारण नेतृत्व और राष्ट्रसेवा की गौरवशाली विरासत को चिरस्थायी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। समर्पण समारोह में लेफ्टिनेंट कर्नल धन सिंह थापा की पुत्रियां मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं। सूर्य कमान के जीओसी-इन-सी लेफ्टिनेंट जनरल अनिंद्य सेनगुप्ता, वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों एवं शहीद के परिवारजनों की गरिमामयी उपस्थिति में समर्पण पट्टिका का अनावरण किया गया। यह अवसर भारतीय सेना की अपने युद्ध नायकों को सदैव स्मरण रखने और उनकी विरासत को भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने की गौरवशाली परंपरा का प्रतीक बना।
वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान तत्कालीन मेजर धन सिंह थापा 1/8 गोरखा राइफल्स के मात्र 28 सैनिकों के साथ पैंगोंग झील के उत्तर में स्थित सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण सिरिजाप-1 पोस्ट की रक्षा कर रहे थे। 20 अक्टूबर 1962 को संख्या और संसाधनों में अत्यधिक विषमता तथा भीषण तोपखाने और मोर्टार फायर के बावजूद उन्होंने अपने सैनिकों का नेतृत्व करते हुए दुश्मन के कई हमलों को विफल कर दिया। अंततः पोस्ट पर दुश्मन का कब्जा होने के बाद उन्हें युद्धबंदी बना लिया गया था। प्रारंभ में उन्हें वीरगति प्राप्त मानकर उनके असाधारण शौर्य एवं नेतृत्व के लिए देश के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया गया था।
मई 1963 में स्वदेश लौटने के बाद उन्होंने भारतीय सेना में अपनी विशिष्ट सेवाएं जारी रखीं और पदोन्नत होकर लेफ्टिनेंट कर्नल के पद तक पहुंचे। वर्ष 1980 में सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने लखनऊ को ही अपना निवास स्थान बनाया और जीवनपर्यंत सेना तथा उसकी गौरवशाली परंपराओं से जुड़े रहे। अब यह नवनिर्मित ‘धन सिंह थापा इंडोर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स’ खेल, फिटनेस और वेलनेस के अत्याधुनिक केंद्र के साथ-साथ शौर्य की जीवंत स्मृति के रूप में भी स्थापित रहेगा। यह समर्पण भारतीय सेना के उस संकल्प को दोहराता है कि उसके वीरों का साहस और बलिदान केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करने वाली संस्थाओं में भी सदैव जीवित रहेगा।

