कैफ़ी आज़मी अकादमी में समकालीन कविता में स्त्री चेतना एवं सामाजिक सरोकारों पर हुआ विमर्श
वरिष्ठ कवयित्री शालिनी सिंह के कविता संग्रह ‘धूप के बंद दरवाजे’ का विमोचन एवं हुई चर्चा
लखनऊ। राजधानी के कैफ़ी आज़मी अकादमी में वरिष्ठ कवयित्री शालिनी सिंह के नवीनतम कविता संग्रह ‘धूप के बंद दरवाजे’ का विमोचन एवं चर्चा कार्यक्रम गरिमापूर्ण ढंग से संपन्न हुआ। इस अवसर पर साहित्यकारों ने समकालीन कविता में स्त्री चेतना और सामाजिक सरोकारों पर गहन विमर्श किया।
कार्यक्रम के प्रथम सत्र का संचालन सलमान खयाल ने किया। लेखकीय वक्तव्य देते हुए शालिनी सिंह ने कहा कि साहित्य मूलतः कमजोरों की कर्मभूमि है और एक साहित्यकार का धर्म उनकी आवाज़ बनना है। उन्होंने लोकगीतों के अपने काव्य-संस्कारों और कोविड काल की त्रासदियों को साझा करते हुए वर्तमान दौर में बढ़ती सांप्रदायिकता पर चिंता जताई।
उन्होंने अपनी चर्चित कविताओं ‘धूप के बंद दरवाजे’, ‘यात्राओं के अनुवाद’ और ‘आकार में छोटी हर चीज़ स्त्रीलिंग नहीं होती’ का पाठ कर सत्ता और समाज को प्रश्नांकित किया। विमोचित कृति पर चर्चा करते हुए वक्ताओं ने संग्रह के विभिन्न आयामों को रेखांकित किया। सीमा सिंह ने कहा कि शालिनी की कविताओं में स्त्री चेतना के साथ व्यापक सामाजिक सरोकार मौजूद हैं। धर्म और राजनीति जैसे कठिन विषयों पर साहस के साथ लिखना सराहनीय है।
विभु प्रकाश सिंह ने कहा कि इस दौर में ये कविताएं एक ‘प्रार्थना’ की तरह हैं। उन्होंने कहा कि कवियों की नैतिक जिम्मेदारी है कि वे लोक-चरित्रों को राजनीति की जकड़ से मुक्त करें। विशाल श्रीवास्तव ने कहा कि स्त्री और दलित विमर्श के सौंदर्यशास्त्र पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि ये कविताएं स्मृतियों पर हो रहे हमलों के बीच उन्हें खूबसूरती से संजोने का कार्य करती हैं। समीना खान ने लेखिका के साथ अपनी स्मृतियों को साझा करते हुए संग्रह की सफलता के लिए बधाई दी।
द्वितीय सत्र में रही काव्य पाठ की गूँज
कार्यक्रम के दूसरे सत्र का संचालन शालू शुक्ला ने किया। इस सत्र में आमंत्रित कवियों ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। काव्य पाठ करने वालों में प्रमुख रूप से अनिल मिश्र, विशाल श्रीवास्तव, सीमा सिंह, अनुजा शुक्ला और अवंतिका सिंह शामिल रहे। कार्यक्रम में शहर के गणमान्य साहित्यकार, बुद्धिजीवी और साहित्य प्रेमी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

