50 साल के साहसिक संघर्ष और त्याग की कहानी: ‘टाइगर गार्जियंस ऑफ दुधवा’ पुस्तक का हुआ विमोचन
किताबवनकर्मियों के अदम्य साहस, दुधवा के अनूठे इतिहास और वन्यजीव संरक्षण की गाथा बयां करती है
लखनऊ | घने जंगलों का सन्नाटा, कदम-कदम पर घात लगाए हिंसक जानवर, और जान हथेली पर रखकर रात-दिन गश्त करते जांबाज वनकर्मी—दुधवा टाइगर रिजर्व के इस 50 साल के रोंगटे खड़े कर देने वाले सफर को अब एक किताब की शक्ल मिल गई है।
आईएएस अधिकारी संजय कुमार द्वारा संकलित और 22 वन अधिकारियों व विशेषज्ञों के दुर्लभ अनुभवों से सजी किताब ‘टाइगर गार्जियंस ऑफ दुधवा’ का विमोचन मंगलवार को नवाब वाजिद अली शाह प्राणि उद्यान में एक भव्य समारोह के दौरान किया गया। उत्तर प्रदेश सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. अरुण कुमार ने अपने हाथों से इस ऐतिहासक किताब का अनावरण किया।
यह महज एक किताब नहीं, बल्कि दुधवा के उन अनाम नायकों की गाथा है जिन्होंने अपनी जिंदगी के सबसे खूबसूरत साल इस जंगल को बचाने में बेजुबानों के बीच बिताए। किताब में दुधवा के 50 सालों के इतिहास को उन 22 फील्ड अफसरों, शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों की नजरों से दर्ज किया गया है, जिन्होंने विषम परिस्थितियों में खूंखार बाघों के बीच रहकर काम किया।
दलदली जमीनों और हिंसक जानवरों से घिरे दुधवा में कैसे गैंडों को सफलतापूर्वक दोबारा बसाया गया, इसकी रोमांचक और चुनौतीपूर्ण इनसाइड स्टोरी इस किताब का हिस्सा है। देश के शीर्ष 4 पार्कों में शुमार दुधवा का भूगोल भारत के अन्य सभी जंगलों से बिल्कुल अलग है। इसमें दर्ज संस्मरण बताते हैं कि कैसे बदलती परिस्थितियों के बीच बाघों की आबादी को सुरक्षित रखा गया।
इंसान बनाम वन्यजीव संघर्ष और एक बड़ा ऐलान
विमोचन के दौरान प्रधान मुख्य वन संरक्षक सुनील चौधरी ने एक कड़वी हकीकत बयां करते हुए कहा कि “जब जंगल में एक बाघ या तेंदुआ हमला करता है तो वो नेशनल न्यूज बन जाता है, लेकिन असल में सबसे ज्यादा जानें सर्पदंश से जाती हैं जिस पर कोई बात नहीं करता।”
उन्होंने कहा कि जंगलों के आसपास बसे गांवों में जागरूकता की सबसे ज्यादा जरूरत है। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए प्रदेश सरकार ने वन्यजीव संरक्षण में अद्वितीय योगदान देने वाले जांबाजों के लिए ‘डॉ. आर.एल. सिंह अवार्ड’ शुरू करने पर अपनी सहमति व्यक्त की।

वनकर्मियों के त्याग को समर्पित एक दस्तावेज
विशिष्ट अतिथि प्रमुख सचिव वी. हेकाली झिमोमी और पीसीसीएफ (वाइल्डलाइफ) अनुराधा वेमुरी ने बताया कि दुधवा की पोस्टिंग हमेशा से सबसे कठिन मानी जाती रही है। आज अगर दुधवा में बाघ दहाड़ रहे हैं, तो इसके पीछे उन अधिकारियों और फील्ड स्टाफ का त्याग है जिन्होंने अपने परिवार से दूर रहकर घने जंगलों में अपनी जान दांव पर लगाई।
समारोह के अंत में उद्यान निदेशक संजय कुमार बिश्वाल ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया। यह किताब पर्यावरण प्रेमियों, शोधकर्ताओं और साहसिक कहानियों के शौकीनों के लिए एक अनमोल खजाना साबित होगी।

