डॉ. रेनू सिंह के राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत काव्यपाठ और संजय सांवरा के संवेदनशील गीतों ने श्रोताओं को प्रभावित कर दिया
विजय ‘तन्हा’ की चुटीली रचनाओं ने गुदगुदाया, उपेन्द्र सिंह ‘सुमन’ ने युवाओं को बुजुर्गों के प्रति संवेदनशीलता का संदेश दिया
लखनऊ: राष्ट्रीय पुस्तक मेला-2026 में शनिवार को आयोजित भव्य कवि सम्मेलन में साहित्य, संवेदना और काव्य-कला का अनोखा संगम देखने को मिला। ‘गायत्री आदित्य साहित्य कला एवं सांस्कृतिक न्यास’ के तत्वावधान में सजी इस साहित्यिक संध्या में जाने-माने कवियों और कवयित्रियों ने अपनी शानदार प्रस्तुतियों से समां बांध दिया। ओज, हास्य-व्यंग्य, प्रेम और जीवन-दर्शन से पिरोई गई कविताओं पर श्रोताओं ने जमकर तालियां बजाईं।
कार्यक्रम का शुभारंभ वैशाली रस्तोगी द्वारा प्रस्तुत मां शारदे की वंदना से हुआ। मुख्य अतिथि बलवीर सिंह राठौर, विशिष्ट अतिथि डॉ. दिनेश अवस्थी और अध्यक्षता कर रहे साहित्यभूषण कमलेश मौर्य ‘मृदु’ की मौजूदगी में महफिल पूरे शबाब पर पहुंची। अध्यक्षीय वक्तव्य में कमलेश मौर्य ‘मृदु’ ने पुस्तकों की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि जब कोई रास्ता न दिखे, तब पुस्तकें ही सबसे सच्ची मित्र बनती हैं।

ओज, व्यंग्य और संवेदना का अनूठा संगम दिखा। कवि सम्मेलन में हर रस की छटा देखने को मिली। ओज की कवयित्री डॉ. रेनू सिंह ने “मैं घायल भारत की बेटी अंगार लिखा करती हूँ” जैसी पंक्तियों से राष्ट्रप्रेम और वीरता का जोश भर दिया। बाराबंकी से आए गीतकार संजय सांवरा ने इंसानी रिश्तों और सामाजिक विडंबनाओं पर अपनी संवेदनशील रचनाओं से सभी को भावुक कर दिया। वहीं, उपेन्द्र सिंह ‘सुमन’ ने युवाओं को बुजुर्गों के प्रति संवेदनशील बनने का संदेश देते हुए कहा कि जवानी के घमंड को छोड़कर बुजुर्गों के पास बैठने की आदत डालनी चाहिए। शाहजहाँपुर के हास्य-व्यंग्य कवि विजय ‘तन्हा’ ने अपनी चुटीली पंक्तियों से पूरे पंडाल में ठहाके लगवा दिए।

कार्यक्रम का सफल संचालन गीतकार संजय सांवरा ने किया, जबकि संयोजन डॉ. रेनू सिंह, निहारिका सिंह और निखिल सिंह ने संभाला। इस अवसर पर योगेश चौहान, अमित श्रीवास्तव, मनमोहन बाराकोटी, अजय मिश्र ‘अब्र’, राघवेंद्र प्रताप वर्मा, पंडित विजय लक्ष्मी, शिखा सिंह, डॉ. छाया त्यागी और मधु कौशिक सहित अनेक साहित्यकारों ने अपनी कालजयी रचनाओं से काव्य-संध्या को यादगार बना दिया।

