एलयू के कला एवं शिल्प महाविद्यालय (आर्ट्स कॉलेज) के छात्र संगठन ‘कलरव’ की ओर से
विश्वविद्यालय की टैगोर लाइब्रेरी के पास स्थित गांधी प्रतिमा पर एक अनूठी कला प्रदर्शनी लगी
लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय के कला एवं शिल्प महाविद्यालय (आर्ट्स कॉलेज) के छात्र संगठन ‘कलरव’ की ओर से विश्वविद्यालय की टैगोर लाइब्रेरी के पास स्थित गांधी प्रतिमा पर एक अनूठी कला प्रदर्शनी लगी। “बोल कि लब आजाद हैं तेरे” शीर्षक वाली इस प्रदर्शनी ने सार्वजनिक स्थल को अभिव्यक्ति, संवाद और हस्तक्षेप के जीवंत केंद्र में बदल दिया।
यह प्रदर्शनी केवल एक सांस्कृतिक प्रदर्शन मात्र नहीं थी, बल्कि उन बढ़ते प्रशासनिक दबावों और नियंत्रणों के खिलाफ एक वैचारिक हस्तक्षेप थी, जो विश्वविद्यालयों के भीतर अभिव्यक्ति और असहमति के स्थानों को सीमित कर रहे हैं। कलाकारों ने स्पष्ट संदेश दिया कि कला केवल सौंदर्यशास्त्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज से संवाद करने और सवाल पूछने की एक सक्रिय भाषा है।
प्रदर्शनी ने इस धारणा को चुनौती दी कि कला केवल दीर्घाओं (गैलरी) की शोभा है। रंगों, आकृतियों और कल्पनाओं के माध्यम से छात्रों ने अपने अनुभवों, चिंताओं और सामाजिक वास्तविकताओं को जनता के बीच रखा।
आन्या चौधरी और श्वेता यादव ने अपनी कलाकृतियां प्रस्तुत कीं। पेंटिंग प्रदर्शनी में नीरज वर्मा, पूर्वी, निखिल, अवंतिका, दिव्यांशी चौधरी, गोल्डी, पूर्णिमा पाठक, सृष्टि, रुक्मिणी निषाद, नितिन, जान्हवी, संतोष वर्मा, अतुल वर्मा, रितेश कपूर, कृष्णा यादव, अनुज चौबे, रुद्र प्रताप सिंह और शनि जैसे विभिन्न वर्षों के छात्रों ने अपनी कृतियों के माध्यम से अपनी बात रखी।
कलाकारों के विचार: कला एक हस्तक्षेप के रूप में
आयोजन के दौरान छात्रों ने कला और समाज के अंतर्संबंधों पर अपने विचार साझा किए। नितिन (तृतीय वर्ष) ने कहा कि “जब संस्थान सवालों से असहज होने लगें, तो कला उन सवालों को और अधिक प्रखरता के साथ वापस लाती है।”
रितेश कपूर (द्वितीय वर्ष) ने कहा कि “आज के समय में बोलना स्वयं में एक राजनीतिक कार्य बन गया है। कला के माध्यम से हम समाज में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।” अतुल वर्मा (तृतीय वर्ष) ने कहा कि “यदि कला को समाज से अलग कर दिया जाए, तो वह केवल सजावट की वस्तु रह जाएगी। हम कला को विचार और हस्तक्षेप के रूप में स्थापित करना चाहते हैं।”
प्रथम वर्ष की छात्रा अवंतिका ने कहा कि इस मंच ने नए छात्रों को यह विश्वास दिलाया कि उनकी आवाज भी मायने रखती है। वहीं निखिल और नीरज ने कला को गैलरी से निकालकर आम जनजीवन की वास्तविकताओं से जोड़ने पर जोर दिया। ‘कलरव’ की यह प्रदर्शनी कला के छात्रों के बीच एक बड़े बदलाव का संकेत है, जहां वे केवल तकनीकी प्रशिक्षण तक सीमित न रहकर अपने समय के ज्वलंत प्रश्नों से टकरा रहे हैं।

