अखिल भारतीय संस्कृत परिषद्, लखनऊ की ओर से शनिवार को हुआ एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन
‘भारतीय ज्ञान परम्परा: विश्वमङ्गलकारक वेद-विज्ञान’ विषय पर विद्वानों ने रखे विचार वेदों में छिपे आधुनिक विज्ञान बताया
लखनऊ। अखिल भारतीय संस्कृत परिषद्, लखनऊ की ओर से शनिवार को ‘भारतीय ज्ञान परम्परा: विश्वमङ्गलकारक वेद-विज्ञान’ विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में काशी, प्रयागराज, उज्जैन और दरभंगा जैसे प्रमुख केंद्रों से आए विद्वानों ने वेदों में छिपे आधुनिक विज्ञान के रहस्यों को उजागर किया।
संगोष्ठी के मुख्य वक्ता, बीएचयू के वैदिक विज्ञान केंद्र के संस्थापक समन्वयक प्रो. उपेन्द्र कुमार त्रिपाठी ने कहा कि भारतीय परंपरा में वेद और विज्ञान एक-दूसरे के पूरक हैं। उन्होंने वेदों के गूढ़ रहस्यों को परत दर परत खोलते हुए उन्हें विश्व कल्याण का आधार बताया।
प्रो. विभूति राय (लखनऊ विश्वविद्यालय) ने स्पष्ट किया कि आधुनिक पीढ़ी को वेद-विज्ञान क्यों समझना चाहिए। प्रो. ओम प्रकाश पाण्डेय (उज्जैन) और प्रो. लक्ष्मीनिवास पाण्डेय (दरभंगा) ने सनातन धर्म के आलोक में वेदों को भारतीयता का आधारभूत स्तंभ बताया।
कार्यक्रम का आरंभ वैदिक और लौकिक मंगलाचरण के साथ हुआ। निखिल, सौरभ तिवारी और सत्यम पाण्डेय ने सस्वर पाठ किया, जबकि समृता और कीर्ति ने मधुर स्वागत गीत प्रस्तुत किया। परिषद् के मंत्री प्रो. प्रयाग नारायण मिश्र ने अतिथियों का वाचिक स्वागत किया और अध्यक्ष डॉ. चन्द्रभूषण त्रिपाठी ने वेदों की प्रासंगिकता पर अपने विचार रखे।
समापन सत्र में विद्वानों ने वेदों के व्यावहारिक पक्षों पर चर्चा की। जिसमें प्रो. महेन्द्र कुमार पाण्डेय (संपूर्णानंद संस्कृत विवि) और प्रो. शीतला प्रसाद पाण्डेय (बीएचयू) ने विशिष्ट वक्ता के रूप में वेद-विज्ञान को अनूठे अंदाज में प्रस्तुत किया। प्रो. मदन मोहन पाठक ने ज्योतिष शास्त्र के साथ वेदों के अंतर्संबंधों को रेखांकित किया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रो. अनिल प्रताप गिरि ने भी विषय पर सारगर्भित विचार साझा किए।
संगोष्ठी में कानपुर की पूर्व प्राचार्या डॉ. रेखा शुक्ला, लखनऊ विश्वविद्यालय के संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. अभिमन्यु सिंह, डॉ. अशोक कुमार शतपथी और डॉ. अनिल पोरवाल सहित 100 से अधिक शोध छात्र और शिक्षाविद् उपस्थित रहे। कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. शतपथी और डॉ. पोरवाल ने किया।

