लखनऊ का स्वतंत्रता संग्राम और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की विरासत
राष्ट्रवाद, छात्रों के साथ जुड़ाव और नागरिक चेतना का गवाह रहा लखनऊ
लखनऊ। सुभाष चंद्र बोस का लखनऊ से केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि एक गहरा भावनात्मक और क्रांतिकारी रिश्ता था। यह शहर उनके राष्ट्रवाद, छात्रों के साथ जुड़ाव और नागरिक चेतना का गवाह रहा है। लखनऊ की गलियां, अस्पताल की दीवारें और विश्वविद्यालय के गलियारे आज भी नेताजी की अदम्य इच्छाशक्ति और क्रांतिकारी विचारों की गूंज सुनाते हैं।
लखनऊ में बोस के शुरुआती कदमों के रूप में अप्रैल 1928 में सर्वदलीय सम्मेलन के दौरान बनी ‘इंडियन इंडिपेंडेंस लीग’ को देखा जाता है। इस लीग की शुरुआत उन युवा राष्ट्रवादियों ने की थी जिन्होंने कांग्रेस की ‘डोमिनियन स्टेटस’ की मांग को ठुकराकर ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ का लक्ष्य चुना था। जवाहरलाल नेहरू के साथ मिलकर बोस ने इस मांग को नई धार दी, जिसने लखनऊ को स्वतंत्रता आंदोलन के केंद्र में स्थापित कर दिया।
स्वास्थ्य और संघर्ष: बलरामपुर अस्पताल
1930 के दशक की शुरुआत में, ब्रिटिश पुलिस की हिरासत के दौरान नेताजी टीबी (तपेदिक) से पीड़ित हो गए थे। ‘द सिलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ सुभाष चंद्र बोस’ (वॉल्यूम 2) के अनुसार, उन्हें इलाज के लिए लखनऊ के प्रसिद्ध बलरामपुर अस्पताल में भर्ती कराया गया था। कठिन समय में भी लखनऊ उनके जीवन के संघर्ष का साक्षी रहा।
बंगाली क्लब में ऐतिहासिक स्वागत (1938)
20 नवंबर, 1938 को जब नेताजी कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने के बाद लखनऊ आए, तो बंगाली क्लब में उनका भव्य स्वागत हुआ। संगीत और सम्मान: कैप्टन राम सिंह ने उनके स्वागत में वायलिन बजाया। क्लब द्वारा उन्हें बंगाली भाषा में एक मानद पत्र भेंट किया गया, जो आज भी क्लब के अभिलेखागार में सुरक्षित है। इस मुलाकात के दौरान लखनऊ के कैप्टन राम सिंह और लेफ्टिनेंट कर्नल एस.के. वर्धन भी मौजूद थे, जो बाद में आजाद हिंद फौज (INA) का हिस्सा बने।
लखनऊ विश्वविद्यालय और युवाओं की प्रेरणा
ब्रिटिश सेंसरशिप के बावजूद, लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र नेताजी के भाषण सुनने के लिए हॉस्टल में रेडियो छिपाकर रखते थे। 1939 का दौरा: ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक के लॉन्च के दौरान वे लखनऊ विश्वद्यालय के मालवीय हॉल (तत्कालीन बेनेट हॉल) पहुंचे। पिन-ड्रॉप सन्नाटा: आधे घंटे तक ‘नेताजी जिंदाबाद’ के नारों के बाद, अगले दो घंटों तक वहां सन्नाटा पसरा रहा क्योंकि छात्र उनके धाराप्रवाह अंग्रेजी भाषण में मंत्रमुग्ध थे। इस प्रवास के दौरान वे कला संकाय के डीन प्रो. एन.के. सिद्धांता के घर रुके थे।

झंडेवाला पार्क का ऐतिहासिक उद्घोष
अमीनाबाद के झंडेवाला पार्क में हुई जनसभा आज भी शहर के मौखिक इतिहास में जीवित है। भीड़ इतनी विशाल थी कि वह अमीनाबाद चौराहे तक फैली हुई थी। यहीं पर नेताजी ने हुंकार भरी थी: “भारत विदेशियों द्वारा बनाया गया संविधान नहीं अपनाएगा। हम अपना संविधान खुद बनाएंगे।”
स्मृतियों का संरक्षण: उत्तर प्रदेश राज्य अभिलेखागार
लखनऊ ने नेताजी की विरासत को कागजों और पत्रों में भी सहेज कर रखा है। व्यक्तिगत पत्र: जितेंद्रनाथ घोष को 30 जून, 1937 को लिखा गया मूल पत्र यहाँ सुरक्षित है। INA लॉगबुक: 1975 में दान की गई 275 पन्नों की दुर्लभ लॉगबुक, जिसमें आजाद हिंद फौज के महत्वपूर्ण विवरण, लेख और तस्वीरें मौजूद हैं।

