‘वह लोगों के दिलों में बसते हैं’: लखनऊ ने वीरेंद्र यादव को नम आंखों से किया याद

Prashant

January 21, 2026

मशहूर आलोचक वीरेंद्र यादव की याद में मंगलवार को लखनऊ में हुई एक शोक सभा

शहर के लेखकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, प्रोफेसरों और कलाकारों का भारी हुजूम उमड़ा

लखनऊमशहूर आलोचक और बुद्धिजीवी वीरेंद्र यादव की याद में मंगलवार को लखनऊ के कैफ़ी आज़मी ऑडिटोरियम में एक शोक सभा का आयोजन हुआ। इस सभा में शहर के लेखकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, प्रोफेसरों और कलाकारों का भारी हुजूम उमड़ा। ‘स्मरण वीरेंद्र यादव’ नाम की इस बैठक में वक्ताओं ने बताया कि वीरेंद्र जी का शहर के लोगों के साथ सिर्फ बौद्धिक ही नहीं, बल्कि बहुत गहरा निजी रिश्ता भी था। कार्यक्रम का आयोजन ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ और ‘इप्टा’ (IPTA) द्वारा मिलकर किया गया था। इस दौरान उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं और समाज के प्रति उनके योगदान पर विस्तार से चर्चा की गई।

दिग्गजों ने दी श्रद्धांजलि

हिंदी संस्थान के पूर्व अध्यक्ष सुधाकर अदीब, पत्रकार राम दत्त त्रिपाठी, लखनऊ यूनिवर्सिटी की पूर्व कुलपति प्रोफेसर रूप रेखा वर्मा और ‘तद्भव’ के संपादक अखिलेश समेत कई बड़ी हस्तियों ने उन्हें याद किया। सभी ने एक सुर में कहा कि वीरेंद्र यादव अपने प्रगतिशील विचारों और सिद्धांतों के प्रति हमेशा अडिग रहे। ‘कथाक्रम’ के आयोजक शैलेंद्र सागर भावुक हो गए। उन्होंने कहा, “हमारी 40 साल पुरानी दोस्ती थी। 1996 में जब से हमने कथाक्रम की शुरुआत की, उन्होंने शायद ही कोई कार्यक्रम छोड़ा हो। पिछला दिसंबर का कार्यक्रम उनकी आखिरी यादों में से एक है।” मशहूर रंगकर्मी सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ ने बताया कि वीरेंद्र जी अपनी विचारधारा से कभी समझौता नहीं करते थे। लेखक शिवमूर्ति ने उन्हें “जीती-जागती संदर्भ पुस्तक” (रेफरेंस बुक) बताया। उन्होंने याद किया कि वीरेंद्र जी को किताबें पढ़ने और दूसरों को किताबें भेंट करने का बहुत शौक था। प्रोफेसर रमेश दीक्षित ने कहा कि वह बिना किसी डर या परिणाम की चिंता किए अपनी बात बेबाकी से रखते थे।

लखनऊ की गलियों में उनकी मौजूदगी

सुधाकर अदीब ने उनके जौनपुर से लखनऊ तक के सफर को याद किया। उन्होंने बताया कि कैसे अमीनाबाद, हजरतगंज की कॉफी हाउस, ब्रिटिश लाइब्रेरी और लखनऊ यूनिवर्सिटी के गलियारों में होने वाली बहसों में वीरेंद्र जी की कमी हमेशा खलेगी। उनके विचार सिर्फ लखनऊ तक सीमित नहीं थे, बल्कि अखबारों और सोशल मीडिया के जरिए देशभर में मशहूर थे। अंत में प्रोफेसर नदीम हसनैन ने बहुत ही सुंदर बात कही, “वीरेंद्र यादव आज हमारे बीच भले ही न हों, लेकिन वह लोगों के दिलों में और उन नेक मकसद में हमेशा जिंदा रहेंगे, जिनके लिए उन्होंने जीवन भर संघर्ष किया।”

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