वृंदावन लाल वर्मा: बुंदेलखंडी संस्कृति और नारी सशक्तिकरण के पुरोधा
वक्ताओं ने कहा कि जयशंकर प्रसाद: राष्ट्रीयता और गहन संवेदना के कवि
लखनऊ। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा शुक्रवार को हिंदी भवन के निराला सभागार में हिंदी साहित्य के दो देदीप्यमान नक्षत्रों— वृंदावन लाल वर्मा एवं जयशंकर प्रसाद की स्मृति में एक दिवसीय संगोष्ठी का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन और डॉ. कामिनी त्रिपाठी द्वारा प्रस्तुत मधुर वाणी वंदना से हुआ।
संस्थान की प्रधान संपादक डॉ. अमिता दुबे ने मुख्य वक्ता डॉ. पुनीत बिसारिया, श्री सुरेंद्र अग्निहोत्री एवं डॉ. नीरज कुमार द्विवेदी का स्वागत उत्तरीय एवं स्मृति चिह्न भेंट कर किया।
डॉ. पुनीत बिसारिया ने कहा कि वृंदावन लाल वर्मा ने अपने साहित्य के माध्यम से इतिहास को एक नए परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया। ‘झांसी की रानी’ में नारी सशक्तिकरण का बेजोड़ चित्रण है, वहीं ‘विराटा की पद्मिनी’ और ‘मृगनयनी’ उनकी अद्भुत कल्पना शक्ति और ऐतिहासिक समझ का प्रमाण हैं। ‘शरणागत’ जैसी रचनाएं भारतीय संस्कृति के ‘रक्षण’ के आदर्श को जीवंत करती हैं।
सुरेंद्र अग्निहोत्री ने प्रकाश डाला कि वर्मा जी ने ‘गढ़कुंडार’ और ‘कचनार’ जैसे उपन्यासों से पाठकों के सम्मुख बुंदेलखंड की भाषा और सांस्कृतिक वैभव को सजीव कर दिया। उनके लेखन में नारी पात्र अत्यंत प्रबल और प्रभावशाली हैं।
डॉ. नीरज कुमार द्विवेदी ने प्रसाद जी के साहित्य पर चर्चा करते हुए कहा कि उनकी रचनाओं में राष्ट्रीयता के तत्व कूट-कूट कर भरे हैं। ‘कामायनी’, ‘झरना’, और ‘कानन कुसुम’ जैसी काव्य कृतियों के साथ-साथ ‘अजातशत्रु’ और ‘स्कंदगुप्त’ जैसे नाटकों ने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। उनके सृजन में जीवन की विरह वेदना और गहन अध्ययन का अनूठा सम्मिश्रण मिलता है।
रचना पाठ और दी सांस्कृतिक प्रस्तुति
संगोष्ठी के दौरान युवा प्रतिभाओं ने कालजयी रचनाओं के अंशों का पाठ कर समां बांध दिया। सौम्या मिश्रा: ‘कीचड़ और कमल’ (वृंदावन लाल वर्मा), उपासना जायसवाल: ‘अमरबेल’ (वृंदावन लाल वर्मा), अनमोल शर्मा: ‘कंकाल’ (जयशंकर प्रसाद), मुस्कान सिंह: ‘आनंद सर्ग’, ‘कामायनी’ एवं ‘आंसू’ (जयशंकर प्रसाद) का पाठ कर प्रभावित किया। कार्यक्रम का कुशल संचालन करते हुए डॉ. अमिता दुबे ने उपस्थित साहित्यकारों, विद्वानों और मीडिया कर्मियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की।

