लखनऊ का ऐतिहासिक इंडियन कॉफी हाउस वित्तीय संकट के चलते तीन महीने से बंद, थमीं साहित्य और राजनीति की बहसें

Anoop

August 31, 2026

लखनऊ के हजरतगंज स्थित 88 साल पुराना ऐतिहासिक इंडियन कॉफी हाउस वित्तीय संकट और स्टाफ की कमी के चलते पिछले तीन महीनों से बंद पड़ा है

पंडित नेहरू, अटल बिहारी वाजपेयी और अमृतलाल नागर जैसी हस्तियों का पसंदीदा केंद्र रहा यह कॉफी हाउस दशकों तक साहित्य, राजनीति और पत्रकारिता की बहसों का मुख्य ठिकाना था

लखनऊ। शहर लखनऊ की साहित्यिक, सामाजिक और राजनीतिक विरासत का गवाह रहा 88 वर्ष पुराना ऐतिहासिक इंडियन कॉफी हाउस पिछले तीन महीनों से वित्तीय संकट और कर्मचारियों की कमी के चलते बंद पड़ा हुआ है। हजरतगंज स्थित इस ऐतिहासिक ठिकाने के दरवाजे पर लटका ताला उन अनगिनत मुलाकातों, बहसों और किस्सों पर विराम लगा चुका है, जिसने इसे दशकों तक शहर का सबसे जीवंत अनौपचारिक बौद्धिक केंद्र बनाए रखा। वर्ष 1938 में ब्रिटिश काल के दौरान स्थापित यह कॉफी हाउस केवल एक रेस्तरां नहीं था, बल्कि इसे लखनऊ की ‘विचार पाठशाला’ कहा जाता था, जहाँ मुख्यमंत्री से लेकर छात्र और वरिष्ठ पत्रकारों से लेकर युवा लेखक एक ही मेज पर बैठकर घंटों देश-प्रदेश के मुद्दों पर संवाद करते थे।

इस ऐतिहासिक स्थान से देश के कई दिग्गज नेताओं और साहित्यकारों की यादें गहराई से जुड़ी रही हैं। पंडित जवाहरलाल नेहरू, अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ. राम मनोहर लोहिया, चंद्रशेखर, फिरोज गांधी, वीपी सिंह और मुलायम सिंह यादव जैसी महान राजनीतिक हस्तियाँ यहाँ आकर बैठती थीं और गंभीर मुद्दों पर चर्चा करती थीं। वहीं, साहित्य जगत की बात करें तो यशपाल, भगवती चरण वर्मा और अमृतलाल नागर की त्रिवेणी के साथ-साथ मजाज लखनवी और अली सरदार जाफरी जैसे रचनाकारों की महफिलें यहाँ सजती थीं। वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कपूर ने इस जगह के समृद्ध इतिहास और किस्सों को संजोते हुए ‘लखनऊ का कॉफी हाउस’ नाम से एक पुस्तक भी लिखी है।

दशकों तक आम आदमी की पहुँच में रहे इस कॉफी हाउस में एक दौर था जब कॉफी महज चार रुपये में मिलती थी, जो समय के साथ बढ़कर पचास रुपये तक पहुँची। हालांकि, पिछले कुछ समय से प्रबंधन लगातार घाटे और कर्मचारियों की समस्या से जूझ रहा था, जिसके चलते अंततः इस पर ताला लगाना पड़ा। कभी शहर की बड़ी-बड़ी खबरों और राजनीतिक रणनीतियों का केंद्र रहा यह कॉफी हाउस आज पूरी तरह खामोश है, जिससे लखनऊ के प्रबुद्ध वर्ग, साहित्यकारों और पुराने ग्राहकों में गहरा दुख और निराशा है।

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