‘1857’ के विमर्श को दी नई दृष्टि, विचारों की विरासत छोड़ गए वीरेंद्र
लखनऊ में अपने आवास पर ली अंतिम सांस, कार्डियक अरेस्ट के चलते हुए निधन
लखनऊ। हिंदी साहित्य और वैचारिक आलोचना की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने वाले प्रख्यात समालोचक वीरेंद्र यादव अब हमारे बीच नहीं रहे। शुक्रवार सुबह हृदय गति रुकने से उनका निधन हो गया। वह 76 वर्ष के थे। उनके जाने से हिंदी का आलोचनात्मक संसार एक सजग, निर्भीक और प्रतिबद्ध आवाज़ से वंचित हो गया है।
लखनऊ के इंदिरा नगर में रहने वाले वीरेंद्र यादव ने साहित्य को केवल अध्ययन की वस्तु नहीं, बल्कि सामाजिक हस्तक्षेप का माध्यम बनाया। वर्ष 1950 में जौनपुर में जन्मे वीरेंद्र यादव ने लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीतिशास्त्र में एमए किया और छात्र जीवन से ही प्रगतिशील विचारधारा से जुड़कर सांस्कृतिक और बौद्धिक संघर्षों में सक्रिय भूमिका निभाई।
वे लंबे समय तक उत्तर प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के सचिव रहे और ‘प्रयोजन’ पत्रिका के संपादक के रूप में उन्होंने विचारोत्तेजक बहसों को मंच दिया। कथा आलोचना में उनकी सतत उपस्थिति ने कई पीढ़ियों को सोचने और सवाल करने की दृष्टि दी।
प्रेमचंद पर चली बहसों में उनकी वैचारिक स्पष्टता और 1857 के स्वतंत्रता संग्राम पर उनका हस्तक्षेपकारी लेखन उन्हें समकालीन आलोचकों की पंक्ति में विशिष्ट बनाता है। जॉन हर्सी की चर्चित कृति ‘हिरोशिमा’ का उनका हिंदी अनुवाद मानवीय संवेदना का एक सशक्त दस्तावेज़ है। उनके लेखों का अंग्रेज़ी और उर्दू में अनुवाद भी हुआ।
आलोचना के क्षेत्र में उनके योगदान को सम्मान देते हुए वर्ष 2001 में उन्हें देवीशंकर अवस्थी सम्मान प्रदान किया गया था, लेकिन उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि वह वैचारिक विरासत है जो वे अपने लेखन और संवाद से छोड़ गए। वीरेंद्र यादव का जाना हिंदी साहित्य के लिए केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि एक संवेदनशील विवेक, एक प्रतिबद्ध आलोचक और एक सच्चे बौद्धिक का मौन हो जाना है। साहित्य जगत उन्हें गहरी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

