गुरुवार को लखनऊ के ‘कला मंडपम’ में हुआ कथक समारोह
पं. बिरजू महाराज की 88वीं जयंती श्रद्धा से मनाई 88वीं जयंती
लखनऊ। जब घुंघरुओं की गूंज और तबले की थाप एक साथ मिलती है, तो वह केवल नृत्य नहीं रह जाता—वह एक इबादत बन जाती है। गुरुवार को लखनऊ के ‘कला मंडपम’ में कुछ ऐसा ही मंजर था, जहां कथक के पं. कालका बिंदादीन घराने के शिखर पुरुष, पं. बिरजू महाराज की 88वीं जयंती श्रद्धा और कला के अद्भुत संगम के साथ मनाई गई।
इस जयंती समारोह में देश के कोने-कोने से आए कलाकारों ने अपनी कला से महाराज जी को याद किया। असम की जुगलबंदी: मां-बेटी की जोड़ी, मर्मी मेघी और मेघारंजनी ने ‘गणेश वंदना’ से शुरुआत की। उन्होंने लखनऊ घराने की बारीकियों को ‘मयूर चाल’ और ‘अश्व चाल’ के माध्यम से जीवंत कर दिया।
अहमदाबाद का संदेश: कुमुदिनी लखिया के समूह ने ‘अब हम कहां जाएंगे’ शीर्षक से एक भावुक एक्ट पेश किया, जिसने जीवन के रहस्यों और संघर्षों को कथक के जरिए पिरोया। समारोह के दौरान महाराज जी के जीवन पर आधारित एक लघु फिल्म ने दर्शकों की आंखें नम कर दीं। फिल्म में उनके जीवन के उन पन्नों को पलटा गया जो संघर्षों से भरे थे।
कैसे ‘कथिक’ समुदाय नवाब आसफ-उद-दौला के समय हंडिया (इलाहाबाद) से अवध आया। पिता के साये के बाद, मात्र 9 वर्ष की उम्र में कंधों पर आई परिवार की जिम्मेदारी और चाचाओं (शंभू और लच्छू महाराज) से मिली कड़ी तालीम। ‘शतरंज के खिलाड़ी’ से लेकर ‘बाजीराव मस्तानी’ तक, बॉलीवुड में कथक की शुद्धता को बनाए रखने का उनका अटूट प्रयास।
पं बिरजू महाराज कथक संस्थान की हेड एवं वरिष्ठ कथक नृत्यांगना कुमकुम धर ने कहा कि “पंडित जी की विरासत केवल डांस स्टेप्स में नहीं, बल्कि उस रूहानियत में है जिसे उन्होंने लखनऊ घराने को दिया। वह चाहते थे कि यह कला हर सीमा को पार कर दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचे।”

लखनऊ घराने की गूंज
भातखंडे विश्वविद्यालय की पूर्व वीसी पूर्णिमा पांडे की उपस्थिति में यह शाम ‘लय-ताल’ के एक ऐसे संगम में तब्दील हो गई, जहां हारमोनियम के सुर और घुंघरुओं की थिरकन ने यह अहसास दिलाया कि महाराज जी आज भी अपनी कला के माध्यम से हमारे बीच जीवित हैं।

