‘पहल’ के माध्यम से प्रगतिशील आंदोलन को ज्ञानरंजन ने दी नई दिशा : वक्ता
साठोत्तरी पीढ़ी के अग्रणी रचनाकार के रूप में हमेशा स्मरणीय रहेंगे ज्ञानरंजन
लखनऊ । प्रसिद्ध कथाकार एवं साहित्यिक पत्रिका ‘पहल’ के संपादक रहे ज्ञानरंजन की स्मृति में शनिवार को बलराज साहनी सभागार, कैसरबाग में श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई। इस अवसर पर लखनऊ के साहित्यकारों, सांस्कृतिक संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उनके साहित्यिक, वैचारिक और संपादकीय योगदान को स्मरण करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की।
जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कौशल किशोर ने कहा कि ज्ञानरंजन सक्रियतावादी लेखक थे, जिनकी भूमिका एक साहित्यिक एक्टिविस्ट की रही। वे साठोत्तरी पीढ़ी के अग्रणी कथाकारों में शामिल थे, जिन्होंने आज़ादी के बाद के सामाजिक यथार्थ को अपनी कहानियों का आधार बनाया। उनकी रचनाओं में यथार्थ को देखने की आधुनिक और प्रगतिशील दृष्टि मिलती है। साहित्यिक जीवन के दूसरे चरण में उन्होंने ‘पहल’ पत्रिका के माध्यम से प्रगतिशील साहित्यिक आंदोलन को नई ऊर्जा दी।
जनवादी लेखक संघ के महासचिव नलिन रंजन ने कहा कि ज्ञानरंजन हिंदी साहित्य के विशिष्ट कथाकार और सफल संपादक के रूप में हमेशा याद किए जाएंगे। ‘घंटा’, ‘बहिर्गमन’ और ‘पिता’ जैसी कहानियों ने उन्हें साहित्य में अमर स्थान दिलाया। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से मध्यवर्ग की नई पीढ़ी की संवेदनाओं को सशक्त अभिव्यक्ति दी।
प्रगतिशील लेखक संघ, लखनऊ की अध्यक्ष रीता चौधरी ने कहा कि ज्ञानरंजन का संघर्ष रचनात्मक के साथ-साथ वैचारिक भी था। ‘पहल’ के जरिए उन्होंने न सिर्फ नए लेखकों को मंच दिया, बल्कि विश्व साहित्य से हिंदी समाज को जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने कहा कि ज्ञानरंजन में कबीर जैसी अक्खड़ता थी—जहां सच होता है, वहीं उनका तेवर दिखाई देता है। उनकी सीमित लेकिन प्रभावशाली कहानियां आज़ादी के बाद के सामाजिक यथार्थ का आईना हैं।
इस अवसर पर इप्टा लखनऊ के अध्यक्ष राजेश श्रीवास्तव, डॉ. राही मासूम रज़ा एकेडमी से भगवान स्वरूप कटियार, भाकपा से कामरेड परमानंद सहित कई वक्ताओं ने शोक संवेदनाएं व्यक्त कीं। लक्ष्मीकांत शर्मा ने उनके साथ बिताए चार दशकों की स्मृतियां साझा कीं। डॉ. अवंतिका सिंह ने कहा कि ज्ञानरंजन का मानना था कि बड़े लेखक छोटे शहरों से निकलते हैं।
कार्यक्रम का संचालन प्रलेस लखनऊ की सचिव इरा श्रीवास्तव ने किया। प्रारंभ में ज्ञानरंजन के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की गई और अंत में दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धा-सुमन अर्पित किए गए। इस अवसर पर बड़ी संख्या में साहित्यकार और संस्कृतिकर्मी उपस्थित रहे।

