लोक से ही कलाओं की उत्पत्ति होती है। कोई भी सांस्कृतिक विधा लोक की माटी से खुद को अलग नहीं कर सकती। नुक्कड़ नाटक भी इसी लोक में जन्मी एक सशक्त कला है, जिसकी रस-गंध समुदायों के सुख-दुख और संघर्षों से उपजती है। भारत में यह विधा आज़ादी से ठीक चार वर्ष पहले अपने स्वरूप में आई और आठ दशकों की रंगयात्रा में इसने आम जनता के बीच अपनी सशक्त पहचान बनाई।
नुक्कड़ नाटक को अक्सर प्रतिरोध की संस्कृति का वाहक माना गया है। यदि विसंगतियों, विडंबनाओं और जड़ता को तोड़ना प्रतिरोध है, तो निस्संदेह नुक्कड़ नाटक प्रतिरोध का सशक्त रंगमंच है। यह विधा राजनीति, संस्कृति और समाज की साझा विरासत पर खड़ी होकर आम आदमी के सवालों, उसके दर्द और संघर्षों को मंच पर लाती है। व्यवस्था और जनता के बीच सेतु बनना ही इसका मूल उद्देश्य रहा है। नुक्कड़ नाटक की विशेषता इसकी त्वरित संप्रेषण क्षमता है।
यह कम समय में, न्यूनतम साधनों के साथ, सौंदर्य, संगीत, अभिनय और कथ्य के जरिए दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। यही इसके सौंदर्यशास्त्र की बुनियाद है। लेकिन आज यह विधा अपनी मौलिकता के गहरे संकट से गुजर रही है। अभिव्यक्ति के नाम पर कुछ भी कर देना नुक्कड़ नाटक मान लिया गया है। बाजारवाद ने इस कला को गंभीर क्षति पहुंचाई है। आज का तथाकथित नुक्कड़ नाटक कई बार इस विधा की आत्मा की ही हत्या करता नजर आता है।
1 जनवरी 1989 को गाजियाबाद के साहिबाबाद में ‘हल्ला बोल’ नाटक के दौरान सफदर हाशमी की हत्या इस बात का प्रमाण थी कि नुक्कड़ नाटक की ताकत से व्यवस्था डरती थी। 1990 के दशक में कलाकारों पर हमले, मुकदमे और प्रतिबंध इसी प्रतिरोधी धार के परिणाम थे। विडंबना यह है कि आज वही नुक्कड़ नाटक सत्ता का प्रचार माध्यम बनता जा रहा है। नुक्कड़ नाटक हमेशा एक सांस्कृतिक आंदोलन रहा है—जो अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाता है और लोकतंत्र में जनता की भूमिका को रेखांकित करता है। आज इस विधा के सामने चुनौती है अपने तेवर, अपनी धार और अपने मूल स्वरूप को बचाने की।
जो कलाकार आज भी ईमानदारी से नुक्कड़ नाटक कर रहे हैं, उन पर बड़ी जिम्मेदारी है कि वे गांवों और शहरों में इस विधा के सौंदर्यशास्त्र, मूल्यों और आयामों पर संवाद करें, नई टीमें तैयार करें और नुक्कड़ नाटक को फिर उसी जनपक्षधर चमक के साथ स्थापित करें, जो कभी इसकी पहचान थी।
- अनिल मिश्र गुरू जी, वरिष्ठ रंगकर्मी, लेखक और स्तंभकार हैं

