स्त्री विमर्श केवल अस्मिता नहीं, मानवता का सवाल है

Anoop

December 6, 2025

रामेश्वरी नेहरू स्मृति दिवस पर लखनऊ में स्त्री दर्पण, प्रलेस व इप्टा का साझा आयोजन

रूपरेखा वर्मा की अध्यक्षता में सुप्रिया पाठक, ऊषा विश्वकर्मा व वंदना चौबे ने रखे विचार

लखनऊ। रामेश्वरी नेहरू के स्मृति दिवस के अवसर पर स्त्री दर्पण, प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) और भारतीय जन नाट्य मंच (इप्टा) की ओर से एक संयुक्त वैचारिक आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रख्यात समाजसेवी एवं लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति रूपरेखा वर्मा ने की, जबकि संचालन प्रगतिशील लेखक संघ की महासचिव इरा श्रीवास्तव ने किया।

कार्यक्रम में स्त्री विमर्श को केवल अस्मिता के दायरे में सीमित किए जाने पर गहन चर्चा हुई। इलाहाबाद से आई वर्धा विश्वविद्यालय की स्त्री अध्ययन विभागाध्यक्ष एवं स्त्रीवादी आलोचक सुप्रिया पाठक, लखनऊ की रेड ब्रिगेड की संस्थापक ऊषा विश्वकर्मा और बीएचयू बनारस के आर्य महिला पीजी कॉलेज की असिस्टेंट प्रोफेसर एवं विचारक वंदना चौबे ने अलग-अलग दृष्टिकोणों से स्त्री विमर्श की व्यापकता पर अपनी बात रखी।

सुप्रिया पाठक ने कात्यायनी की पुस्तक ‘दुर्ग द्वार पर दस्तक’ और अनामिका की ‘स्त्रीत्व का मानचित्र’ का हवाला देते हुए कहा कि विभिन्न वर्गों और जातियों की स्त्रियां जब संघर्ष करती हैं तो वह केवल अपनी अस्मिता के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए होता है। स्त्री विमर्श को सिर्फ अस्मिता विमर्श में बांध कर देखना उसके व्यापक सामाजिक अर्थ को सीमित कर देता है। उन्होंने कहा कि जिस दिन समाज स्त्रियों को मनुष्य मानकर उनके साथ बराबरी का व्यवहार करने लगेगा, उस दिन किसी भी प्रकार के अस्मिता विमर्श की आवश्यकता नहीं रह जाएगी।

उन्होंने स्त्री के स्व-बोध  पर विशेष बल दिया। रेड ब्रिगेड की संस्थापक ऊषा विश्वकर्मा ने कहा कि यह दुनिया अभी एक इंसान के लिए खूबसूरत नहीं है। इसे बदलने के लिए हमें दलित बस्तियों और कामगार स्त्रियों से जमीनी रिश्ते बनाने होंगे। वंदना चौबे ने स्त्री विमर्श को नए संदर्भों में देखने की जरूरत बताते हुए कहा कि स्त्री विमर्श को केवल अस्मिता के दायरे से आगे ले जाना होगा। उन्होंने रंगनायकम्मा की पुस्तक घरेलू काम और बाहरी काम’ का हवाला देते हुए स्त्री-पुरुष के बीच श्रम के समान विभाजन पर जोर दिया।

मेरी नजर में स्त्रीवाद वास्तव में समानतावाद है : रूपरेखा वर्मा

कार्यक्रम की अध्यक्ष रूपरेखा वर्मा ने कहा, “मेरे लिए स्त्रीवाद ही मानवतावाद है। स्त्रियों की कोई अलग पहचान गढ़ने की जरूरत नहीं है, क्योंकि हम भी पुरुषों की तरह अंततः मनुष्य ही हैं।” उन्होंने कहा कि स्त्री विमर्श के कई स्वर हैं, उसे किसी एक वर्ग में सीमित करना उचित नहीं। कुछ धाराएं अस्मितावादी हैं, लेकिन वास्तविक स्त्रीवाद समानता, अधिकार और आजादी के साथ-साथ स्त्रियों की विशिष्ट जरूरतों की पहचान भी करता है, जैसे मातृत्व का अधिकार।

कार्यक्रम में वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना, कवि कात्यायनी, आलोचक वीरेंद्र यादव, सामाजिक कार्यकर्ता प्रो. रमेश दीक्षित, कवि-पत्रकार सुभाष राय, लेखक प्रताप दीक्षित, प्रो. नलिन रंजन, राजेश श्रीवास्तव, परमानंद, प्रदीप घोष, सईदा सायरा, डॉ. अवंतिका, सुनीता घोष, कल्पना पांडे, रामशंकर वर्मा, शालिनी सिंह, शकील सिद्दीकी, दया शंकर राय सहित कई शोधार्थी एवं सामाजिक कार्यकर्ता बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

स्त्री लेखा पत्रिका का विमोचन

कार्यक्रम की शुरुआत स्त्री लेखा पत्रिका के विमोचन से हुई। पत्रिका के संपादक वरिष्ठ कवि-आलोचक विमल कुमार हैं, जो स्त्री दर्पण का ऑनलाइन प्लेटफॉर्म भी संचालित करते हैं। चंडीगढ़ से आई कवि-आलोचक सुधा तिवारी ने पत्रिका पर प्रकाश डाला, जबकि बाराबंकी से आई स्त्री जागरण अध्येता अलका तिवारी ने नवजागरण काल में स्त्रियों की भूमिका के संदर्भ में रामेश्वरी नेहरू एवं उनके द्वारा संपादित ‘स्त्री दर्पण’पत्रिका के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित किया।

नाटक ‘बहुरूपिया’ का प्रदर्शन

शाम को इप्टा कार्यालय 22,कैसरबाग स्थित बलराज साहनी प्रेक्षागृह में सुप्रसिद्ध रंगकर्मी, अभिनेता एवं निर्देशक लकी गुप्ता ने नाटक ‘बहुरूपिया’ का प्रदर्शन किया गया। नाट्यलेख सुप्रसिद्ध नाटककार राजेश कुमार का था। बहरूपिया एक कलाकार की विवशता,उसके साथ हुए भेदभाव,उत्पीड़न की जीवंत दास्तान है जिसे लकी जी गुप्ता ने स्वांग करने वाले के विविध रूपों में व्यक्त किया। लकी जी गुप्ता दर्शकों से संवाद और तादात्म्य बिठाने में यकीन रखने वाले रंगकर्मी हैं जिसका अपने पहले के किए गए नाटक के अनुरूप इस नाटक में भी उन्होंने बखूबी प्रदर्शन किया। इसके बाद उन्होंने दर्शकों के अनुरोध पर अपने पुराने नाटक मां मुझे टैगोर बना दे का एक अंश भी प्रस्तुत किया जिसे सभी दर्शकों ने भरपूर सराहा।

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