शेक्सपियर व कालिदास के नाटकों में अनेक सामाजिक आदर्श लोक सामान्य के लिए आज भी प्रासंगिक व उपयोगी हैं

Anoop

October 26, 2025

अखिल भारतीय संस्कृत परिषद्, लखनऊ में शनिवार को हुआ विशेष व्याख्यान

‘विलियम शेक्सपियर के कृतित्व’ पर कालिदास का प्रभाव’ विषयक हुआ व्याख्यान

लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय के संस्कृत- प्राकृत भाषा विभाग के सहायक आचार्य डॉ.शोभाराम दुबे ने बतौर मुख्य वक्ता कालिदास का शेक्सपियर के साथ सम्बन्ध जोड़ते हुए दोनों की भिन्नताओं और समानताओं पर प्रकाश डाला। विद्वतजन संगोष्ठी में परिषद् के मन्त्री प्रो. प्रयाग नारायण मिश्र ने वाचिक स्वागत करते हुए विषय का प्रवर्तन किया। कार्यक्रम में श्री रामलाल संस्कृत पाठशाला, सरौंसा, सीतापुर के प्रबन्धक विजय कुमार त्रिपाठी मुख्य अतिथि व शाहजहांपुर के प्रतिष्ठित समाज सेवी डॉ.रामशंकर पाण्डेय ने विशिष्ट अतिथि के रूप में अपने मत व्यक्त किये।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए परिषद् के अध्यक्ष  डॉ. चन्द्र भूषण त्रिपाठी ने कालिदास और शेक्सपियर के संबन्ध में अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का संचालन परिषद् के सांस्कृतिक मन्त्री डॉ.अनिल कुमार  पोरवाल ने  किया।  धन्यवाद ज्ञापन परिषद् के अपर मन्त्री एवं लखनऊ विश्वविद्यालय के संस्कृत-प्राकृत भाषा विभाग के अध्यक्ष डॉ. अभिमन्यु सिंह ने किया। कार्यक्रम में वैदिक मङ्गलाचरण रंजना निखिल, लौकिक मङ्गलाचरण आकाश मिश्रा व शान्तिपाठ निशांत ने किया। कार्यक्रम संयोजिका डॉ.पत्रिका जैन, डॉ.अशोक कुमार शतपथी, डॉ.ऋतु सिंह, डॉ. रेखा शुक्ला, डॉ.गौरव सिंह, डॉ. शालिनी साहिनी, डॉ. सुनयना, डॉ. नीलम पाण्डेय, ज्योतिष एवं  संस्कृत विभाग, लविवि के शोधछात्रों सहित अनेक श्रोता मौजूद रहे।

मुख्य वक्तव्य देते हुए डॉ. शोभा राम दुबे ने बताया कि  अंग्रेजी के महान् लेखक तथा महाकवि शेक्सपियर संस्कृत साहित्य से बहुत प्रभावित थे। इनको प्रभावित करने वाले संस्कृत के रचनाकारों में महाकवि कालिदास का नाम सर्वोपरि है। मानव की नैसर्गिक प्रवृत्तियों में प्रेम, क्रोध, घृणा, साहस, क्षमा, उदारता, विश्वास आदि को अंग्रेजी व हिन्दी के साहित्यकारों ने अपने नाटकों में बहुत ही सुन्दर ढंग से प्रदर्शित किया है। शेक्सपियर ने कालिदास की भांति ही अनेक प्रकार के मनुष्यों, पुरुषों व स्त्रियों की चित्तवृत्तियों, भावनाओं, विकारों की कल्पना करने का सामर्थ्य रखने के कारण अपने पात्रों में पूर्ण सजीवता भर दी है, मानो उन्हें अपने सम्मुख एक बड़ा ही विस्तृत और गहन सोने का संसार खड़ा मिला। मानव-जीवन कितना अस्थिर, अशांत और ऊहापोह भरा है, तथापि जीवन-धारा कभी अवरुद्ध न होकर समस्त विश्रृंखलताओं के मध्य भी अबाध बहती रहती है।

उनकी कृतियों के मूल में भी ठीक यही प्रेरणा है। कहना न होगा उनकी रचनायें विभिन्न जीवन-चित्रों के वास्तविक दर्पण हैं, जिनमें सम्पूर्ण मानव जीवन की झांकी मिलती है। कालिदास और शेक्सपियर- दोनों ही में विलक्षण प्रतिभा है और उनकी रचनाओं का क्षेत्र विशद एवं विविधता से पूर्ण है। इन महाकवियों के व्यक्तिगत अनुभव के इतने विचित्र और रंगीन चित्र भरे पड़े हैं कि उनके ज्ञान के अक्षय भंडार को देख कर दांतों तले उंगली दबानी पड़ती है। उनके नाटक कला और सौंदर्य के उस विशाल महासरोवर के समान हैं, जिनमें सौन्दर्य-द्रष्टा-कला-पारखी छककर अपनी प्यास बुझाते हैं और अपनी परिवर्तित भावभंगी के साथ-साथ तरह-तरह का रसास्वादन कर अपने को कृतकृत्य मानते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि शेक्सपियर व कालिदास के नाटकों मे अनेक सामाजिक आदर्श लोक सामान्य के लिए आज भी प्रासंगिक व उपयोगी प्रतीत होते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *