स्मार्ट प्रीपेड मीटर की लागत टैरिफ में जोड़ने की तैयारी, बिजली दरें 5–6 फीसदी बढ़ने की आशंका
सरकारी आदेश के बावजूद उपभोक्ताओं पर बोझ डालने का आरोप, स्मार्ट मीटर को लेकर विरोध तेज
लखनऊ।उत्तर प्रदेश के बिजली उपभोक्ताओं के लिए आने वाला समय महंगा साबित हो सकता है। पावर कॉरपोरेशन ने वर्ष 2026–27 के लिए दाखिल वार्षिक राजस्व आवश्यकता (एआरआर) प्रस्ताव में स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाने का खर्च करीब 3,800 से 4,000 करोड़ रुपये दर्शाया है। यदि यह खर्च बिजली टैरिफ में जोड़ा गया, तो बिजली दरों में पांच से छह प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो सकती है।
पावर कॉरपोरेशन की ओर से दाखिल एआरआर में बताया गया है कि मार्च 2026 तक स्मार्ट प्रीपेड मीटर परियोजना पर यह राशि खर्च होगी। अकेले इस मद का बोझ उपभोक्ताओं पर पड़ने से बिजली दरों में बढ़ोतरी तय मानी जा रही है। इसके अलावा, एआरआर में अन्य खर्च और घाटे भी शामिल किए गए हैं, जिससे बिजली और महंगी होने की आशंका जताई जा रही है।
खास बात यह है कि भारत सरकार ने वर्ष 2023 में स्पष्ट निर्देश जारी किए थे कि स्मार्ट प्रीपेड मीटर की किसी भी प्रकार की लागत उपभोक्ताओं पर नहीं डाली जाएगी। ऊर्जा मंत्री ने भी विधानसभा में यह बयान दिया था कि पुराने मीटर हटाकर लगाए जाने वाले स्मार्ट प्रीपेड मीटर का खर्च सीधे उपभोक्ताओं से नहीं लिया जाएगा। इसके बावजूद एआरआर में एक वर्ष का भारी-भरकम खर्च जोड़े जाने पर सवाल उठ रहे हैं।
मामले की जानकारी मिलते ही राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है। परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने कहा कि पावर कॉरपोरेशन ओपेक्स मॉडल के तहत प्रति माह स्मार्ट मीटर का खर्च उपभोक्ताओं पर डालने की कोशिश कर रहा है, जिसे किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने इसे भारत सरकार के आदेशों का खुला उल्लंघन बताया।
परिषद का आरोप है कि स्मार्ट प्रीपेड मीटर परियोजना के तहत पहले 18,885 करोड़ रुपये के टेंडर को बढ़ाकर करीब 27,342 करोड़ रुपये में कंपनियों को दिया गया है और अब इसी बढ़ी हुई लागत का बोझ उपभोक्ताओं पर डालने का प्रयास किया जा रहा है।

