उ.प्र. हिंदी संस्थान की ओर से हिंदी भवन, लखनऊ में ‘मयंक स्मृति समारोह
हुई एक दिवसीय संगोष्ठी, साहित्यकारों ने रचनात्मक योगदान पर डाला प्रकाश
लखनऊ। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य के दो प्रमुख हस्ताक्षरों द्वारिका प्रसाद महेश्वरी एवं चंद्रपाल सिंह यादव ‘मयंक’ की स्मृति में सोमवार को हिंदी भवन, लखनऊ के निराला सभागार में संगोष्ठी हुई। सरोज खुड़बे की वाणी वंदना में शुरु हुई संगोष्ठी में मुख्य अतिथि डॉ. सुरेंद्र विक्रम, डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’ एवं डॉ. रजनीकांत शुक्ल उपस्थित रहे। अतिथियों का स्वागत उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के प्रधान संपादक डॉ. अमित दुबे ने किया।
डॉ. सुरेंद्र विक्रम ने कहा कि द्वारिका प्रसाद महेश्वरी की कविताएं बाल मन को आनंदित करती हैं और भावनात्मक रूप से जोड़ती हैं। उनकी रचनाएं सरल, सहज और सजीव हैं। ‘बाल गीतायन’ उनकी महत्वपूर्ण काव्य कृति है। उन्होंने बाल साहित्य को समृद्ध करने में उल्लेखनीय योगदान दिया और बच्चों को परम हंस की श्रेणी में रखने वाली दृष्टि प्रदान की।
डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’ ने कहा कि यदि द्वारिका प्रसाद महेश्वरी बाल साहित्य के सूर्य थे, तो चंद्रपाल सिंह यादव ‘मयंक’ उस आकाश के चंद्रमा थे। मयंक ने विविध विधाओं में बाल साहित्य की रचना कर उसे संस्कारों से जोड़ा। उनकी चर्चित रचना ‘कंटीली है जाड़े की रात’ बाल साहित्य की महत्वपूर्ण कृतियों में शामिल है। डॉ. रजनीकांत शुक्ल ने कहा कि मयंक जी शिशुगीत और बालगीत लिखते समय बच्चों के साथ घुल-मिल जाते थे। उनकी रचनाओं में जीवन की सहजता, सरलता और बच्चों की मस्ती स्पष्ट झलकती है। उनकी कृति ‘यहां सुमन बिखरे दो’ में जीवन से जुड़े कई रोचक प्रसंग मिलते हैं।
कार्यक्रम के दौरान द्वारिका प्रसाद महेश्वरी की रचनाएं ‘बढ़े चलो’, ‘मुन्नी- मुन्नी’ तथा चंद्रपाल सिंह यादव ‘मयंक’ की रचनाएं ‘रानी बिटिया’, ‘जग को स्वर्ग बनाना है’ का पाठ ज्योति गुप्ता द्वारा किया गया। वहीं महेश्वरी की रचनाएं ‘हम सब सुमन एक उपवन के’, ‘जलाते चलो’ तथा मयंक की कहानी ‘परीक्षा’ का पाठ शिखा वर्मा ने प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन करते हुए डॉ. अमित दुबे ने आभार व्यक्त किया।

