विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने अपने प्रदर्शन के दौरान लगाया आरोप लगाया
निजीकरण के विरुद्ध चल रहे आंदोलन के 453 दिन पूरे होने पर आक्रोश और बढ़ गया
लखनऊ । उत्तर प्रदेश में बिजली कर्मियों और प्रबंधन के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने आरोप लगाया है कि ऊर्जा निगमों के निजीकरण की तैयारी और कर्मचारियों को मिल रही रियायती बिजली की सुविधा को समाप्त करने के उद्देश्य से उनके आवासों पर जबरन स्मार्ट मीटर लगाए जा रहे हैं।
संघर्ष समिति के केंद्रीय पदाधिकारियों के अनुसार, यह कार्रवाई मुख्यमंत्री के साथ हुए लिखित समझौते और ‘उत्तर प्रदेश पावर सेक्टर रिफॉर्म एक्ट’ का खुला उल्लंघन है। समिति ने स्पष्ट किया कि 25 जनवरी 2000 का समझौता: तत्कालीन मुख्यमंत्री के साथ हुए समझौते के तहत रियायती बिजली की सुविधा को पूर्ववत जारी रखने का प्रावधान है।
ट्रांसफर स्कीम 2000: इसकी धारा 12(बी)(2) के तहत बिजली कर्मियों और पेंशनरों की रियायती दर पर बिजली सुविधा उनकी सेवा शर्तों का अभिन्न हिस्सा है, जिसे कम नहीं किया जा सकता। इलेक्ट्रिसिटी एक्ट 2003: धारा 133(2) भी कर्मचारियों की सेवा शर्तों और सुविधाओं के संरक्षण की पुष्टि करती है।
निजीकरण की आशंका और आक्रोश
संघर्ष समिति का आरोप है कि लखनऊ में ‘वर्टिकल व्यवस्था’ लागू कर और कर्मचारियों के घरों पर युद्ध स्तर पर स्मार्ट मीटर लगाकर निजी कंपनियों को लाभ पहुँचाने (फ्रेंचाइजीकरण) की जमीन तैयार की जा रही है। इसके विरोध में आज प्रदेश के सभी जनपदों में बिजली कर्मियों ने प्रदर्शन कर जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपा।
26 फरवरी को बड़ी बैठक
निजीकरण के विरुद्ध चल रहे आंदोलन के 453 दिन पूरे होने पर आक्रोश और बढ़ गया है। संघर्ष समिति ने 26 फरवरी को लखनऊ में प्रांतीय कार्यकारिणी की बैठक बुलाई है, जिसमें लघु जल विद्युत परियोजनाओं को निजी हाथों में सौंपने और रियायती बिजली पर हो रहे प्रहार के खिलाफ आगामी बड़े आंदोलन की रणनीति तय की जाएगी।

