काम के अधिकार को बुनियादी हक बनाए बिना नहीं मिटेगी असमानता: पी. साईनाथ

Prashant

February 15, 2026

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित पी. साईनाथ का व्याख्यान

‘जन विचार मंच’ द्वारा आयोजित संगोष्ठी ‘असमानता के दौर में मीडिया’ को संबोधित किया

लखनऊ। वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित पी. साईनाथ ने कहा है कि भारत में बढ़ती आर्थिक, सामाजिक, लैंगिक और भाषाई असमानता को तब तक कम नहीं किया जा सकता, जब तक ‘काम के अधिकार’ को संविधान के बुनियादी अधिकारों में शामिल नहीं कर लिया जाता। शनिवार को लखनऊ के कैफी आज़मी ऑडिटोरियम में ‘जन विचार मंच’ द्वारा आयोजित संगोष्ठी ‘असमानता के दौर में मीडिया’ को संबोधित करते हुए साईनाथ ने देश की वर्तमान स्थिति पर तीखे प्रहार किए।

साईनाथ ने आंकड़ों के जरिए राजनीति में बढ़ते धनबल को उजागर करते हुए बताया कि जहाँ 2004 में लोकसभा के 543 सांसदों में से केवल 30 प्रतिशत करोड़पति थे, वहीं 2024 तक यह आंकड़ा बढ़कर 93 प्रतिशत तक पहुँच गया है। उन्होंने देश में मौजूद गहरे विरोधाभास पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि एक तरफ संयुक्त राष्ट्र की मानव विकास रिपोर्ट में भारत 134वें स्थान पर खिसक गया है, तो दूसरी तरफ देश में डॉलर अरबपतियों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है।

सामाजिक विषमता का जिक्र करते हुए उन्होंने महाराष्ट्र का उदाहरण दिया। साईनाथ ने कहा कि जहाँ एक ओर धन्ना सेठों की शादियों में पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है, वहीं महाराष्ट्र के करीब तीन लाख परिवारों ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि वे गरीबी के कारण अपने बच्चों की शादी तक नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि आज 2025-26 के दौर में भारत में असमानता ब्रिटिश राज के समय से भी अधिक भयावह हो चुकी है।

मीडिया की वर्तमान स्थिति पर टिप्पणी करते हुए साईनाथ ने कहा कि आज ‘मीडिया’ और ‘पत्रकारिता’ दो अलग-अलग चीजें हो गई हैं। पत्रकारिता का धर्म गरीब और वंचित जनता के मुद्दों को सामने लाना था, लेकिन आज मीडिया का मुख्य उद्देश्य केवल मुनाफा कमाना रह गया है। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘तगड़ा सूखा सबके मन भावे’ की चर्चा करते हुए बताया कि कैसे ग्रामीण समस्याओं को मुख्यधारा में लाने की कोशिश की गई है, जिसके अब तक 12 भाषाओं में 68 संस्करण आ चुके हैं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार नवीन जोशी ने कहा कि तीन दशक पहले हिंदी अखबारों में ‘गाँव की चिट्ठी’ जैसे कॉलम होते थे, जिनमें ग्रामीण समस्याओं को जगह मिलती थी, लेकिन समय के साथ गाँवों का स्पेस अखबारों में कम होता जा रहा है। संगोष्ठी में प्रमुख रूप से लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति डॉ. रूप रेखा वर्मा, प्रोफेसर रमेश दीक्षित, प्रोफेसर नदीम हसनैन, मधु गर्ग, वंदना मिश्र, अंशु केडिया और बड़ी संख्या में छात्र व सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन प्रतुल जोशी ने किया।

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