गुरु तेग बहादुर की वाणी के सार्वभौमिक नैतिक मूल्य आज भी प्रासंगिक हैं
उनकी जीवनी और शिक्षाओं को पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए
लखनऊ। उत्तर प्रदेश पंजाबी अकादमी की ओर से गुरु तेग बहादुर के 350वें शहीदी वर्ष और विश्व हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में शुक्रवार 09 जनवरी को इन्दिरा भवन में “राष्ट्रीय चेतना-हिन्द की चादर गुरु तेग बहादुर विषयक एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें वक्ताओं ने संदेश दिया कि गुरु तेग बहादुर की वाणी के सार्वभौमिक नैतिक मूल्य आज भी प्रासंगिक हैं। इस अवसर पर अकादमी के प्रतिनिधि के रूप में अरविन्द नारायण मिश्र ने संगोष्ठी में उपस्थित वरिष्ठ विद्वानों को अंगवस्त्र और स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित भी किया।
संगोष्ठी में वरिष्ठ पंजाबी विद्वान नरेन्द्र सिंह माँगा ने बताया कि गुरु तेग बहादुर साहिब द्वारा अपनी संपूर्ण वाणी का, हिन्दी में ही उच्चारण किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि इसे हिंदी पाठ्यक्रम में शामिल करने की आवश्यकता है। दरअसल यह धार्मिक ही नहीं सांस्कृतिक और नैतिक शिक्षा के दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। गुरु तेग बहादुर की वाणी में सार्वभौमिक नैतिक मूल्य, करुणा, निडरता, धार्मिक सहिष्णुता और बलिदान के संदेश हैं। ये मूल्य किसी विशेष धर्म तक सीमित नहीं हैं और आधुनिक समाज में नैतिक शिक्षा के लिए अत्यंत प्रासंगिक हैं।
नवयुग कन्या महाविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग की विभागाध्यक्ष मेजर डॉ. मनमीत कौर सोढ़ी ने कहा कि गुरु तेग बहादुर का बलिदान केवल सिख या हिन्दू समाज के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए था। कश्मीरी पंडितों की रक्षा के लिए दिया गया उनका सर्वोच्च त्याग भारतीय संस्कृति की उदार और साहसी परंपरा को दर्शाता है। उनके अनुसार गुरु तेग बहादुर का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व है। वह भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं, जिन्हें ‘हिंद दी चादर’ अर्थात भारत की ढाल, कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने कश्मीरी पंडितों के धार्मिक अधिकारों की रक्षा के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया था। उनकी जीवनी और शिक्षाओं को पाठ्यक्रम में शामिल करना, छात्रों को भारतीय इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय से अवगत कराएगा।
वरिष्ठ विदुषी डॉ. रश्मि शील के अनुसार गुरु तेग बहादुर साहिब का साहित्यिक सृजन उच्च कोटि का है। गुरु साहिब की वाणी में पद और दोहे शामिल हैं। उन्हें हिंदी पाठ्यक्रम में शामिल करने से छात्र हिंदी-ब्रज भाषा के समृद्ध भक्ति साहित्य से परिचित होंगे, क्योंकि उनकी सभी रचनाएं हिंदी की उपबोली ब्रजभाषा में लिखी गई हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग की प्रोफेसर, डॉ. अलका पाण्डेय ने कहा कि गुरु तेग बहादुर के त्याग से प्रेरणा लेकर सशक्त और जागरूक राष्ट्र का निर्माण संभव है। कार्यक्रम में मीना सिंह, महेन्द्र प्रताप वर्मा, रवि यादव, अंजू सिंह सहित पंजाबी समाज के गणमान्य जन उपस्थित रहे।

